Friday , 14 December 2018
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इसरो ने फ्रेंच गुयाना से जीसैट-11 अंतरिक्ष में भेजा, इससे इंटरनेट की स्पीड बढ़ेगी; विदेशी धरती से भारतीय सैटेलाइट की आखिरी लॉन्चिंग

नई दिल्‍ली. इसरो ने बुधवार को फ्रेंच गुयाना से देश का सबसे वजनी उपग्रह जीसैट-11 लॉन्च किया. जीसैट-11 ने तड़के 2:07 बजे एरियन-5 रॉकेट से उड़ान भरी. यह 33 मिनट में कक्षा में स्थापित हुअा. इससे इंटरनेट दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुुंचेगा. इंटरनेट की रफ्तार बढ़ेगी. यह टेलीकॉम और डीटीएच में अहम भूमिका निभाएगा. इसकी उम्र 15 साल है. जीसैट-11 को बनाने में 500 करोड़ रुपए खर्च हुए. इसका हर सोलर पैनल चार मीटर से ज्यादा लंबा है.

जीसैट-11 में अन्य जीसैट से ज्यादा गति देने की क्षमता है. इसमें 40 ट्रांसपोंडर लगे हैं. ट्रांसपोंडर विशेष सिग्नल ग्रहण करने वाले इलेक्ट्रिक उपकरण हैं. जीसैट-11 को इस साल 25 मई को लॉन्च किया जाना था, लेकिन टाल दिया गया. दरअसल, कुछ दिन पहले इसरो का जीसैट-6ए लॉन्चिंग के बाद अंतरिक्ष में खो गया था. जीसैट- 6ए के पुर्जों जैसे कुछ पुर्जे जीसैट-11 में भी लगे हैं. ऐसे में इसरो ने जीसैट-11 के पुर्जों को दोबारा टेस्ट किया, ताकि यह विफल न हो जाए.

इसरो चेयरमैन के सिवन ने कहा कि जीसैट-11 विदेशी धरती से संभवत: भारतीय सैटेलाइट की अंतिम लॉन्चिंग है. इसरो लाॅन्चर रॉकेट की क्षमता बढ़ाने और सैटेलाइट का वजन कम करने की कोशिश कर रहा है. जीसैट-11 का वजन 5.86 टन है. इसके पहले इसरो ने जीएसएलवी मार्क-3 की मदद से जीसैट-29 सैटेलाइट लॉन्च किया था. मार्क-3 की क्षमता चार टन वजन अंतरिक्ष में ले जाने की है. जीसैट-29 का वजन 3.4 टन था. यदि इसरो के पास मार्क-3 न होता तो शायद जीसैट-29 के लिए भी विदेश जाना पड़ता.

अगले छह महीने में इसरो छह टन वजन के सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजने में सक्षम होगा. देश को अपने सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए विदेशी रॉकेट की जरूरत नहीं होगी. अभी तक सैटेलाइट का 60 फीसदी वजन ऑनबोर्ड केमिकल फ्यूल की वजह से होता है. इलेक्ट्रिक पावर का इस्तेमाल कर वजन कम किया जा सकता है. इसरो इसका सफल टेस्ट कर चुका है. इसरो 500 किग्रा तक के सैटेलाइट अंतरिक्ष में ले जाने वाला रॉकेट और रीयूजेबल रॉकेट विकसित कर रहा है.

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