उदयपुर के संस्थापक महाराणा उदय सिंह की 498वीं जयंती

उदयपुर (Udaipur). विश्वस्तर पर पहचाने जाने वाले अरावली पहाड़ियों की गिर्वा घाटी के पीछोला झील किनारे बसे उदयपुर (Udaipur) शहर के संस्थापक मेवाड़ के 53वें एकलिंग दीवान महाराणा उदय सिंह (द्वि.) की आज 498वीं जयंती है. महाराणा उदय सिंह, महाराणा संग्राम सिंह की रानी कर्णावती (कर्मवती) के द्वितीय पुत्र थे. महाराणा मेवाड़ चेरिटेबल फाउण्डेशन उदयपुर (Udaipur) के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी भूपेन्द्र सिंह ने बताया कि उदयपुर (Udaipur) के संस्थापक महाराणा उदय सिंह का जीवन बचपन से ही संघर्षभरा रहा. महाराणा विक्रमादित्य चिŸाौड की गद्दी पर बैठे तब उदय सिंह छोटे थे. ई.स. 1535 में गुजरात के बहादुर शाह ने चिŸाौड़ पर दूसरी बार आक्रमण किया तब उनकी माता रानी कर्णावती ने मेवाड़ की रक्षा के लिए जौहर कर दिया था. एक दिन बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या (Murder) कर चिŸाौड़ पर अधिकार कर लिया तब किसी तरह पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान दे मेवाड़ के होने वाले स्वामी बालक उदय सिंह के प्राणों की रक्षा की. मातृभू की रक्षा में हुए ऐसे अनेकों बलिदानों से मेवाड़ का इतिहास विश्वभर में अद्वितीय है. उदयपुर (Udaipur) नगर की स्थापना कर महाराणा उदय सिंह ने मेवाड़ को सदा-सदा के लिए सुरक्षित कर दिया.

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मध्यकालीन मेवाड़ की सैन्य नीति के निर्माता महाराणा उदय सिंह द्वितीय

महाराणा उदय सिंह द्वितीय के पूर्व मेवाड़ की सैन्य नीति राजपूत योद्वाओं द्वारा युद्व स्थल पर लड़ते हुये विजय अथवा वीरगति प्राप्त करने की थी. पराजय की स्थिति में राजपूत महिलाएँ जौहर करके अपने स्वाभिमान की रक्षा करती थी. उदय सिंह जी महाराणा संग्राम सिंह के एकमात्र जीवित पुत्र थे और उनके प्राणों की रक्षा करके ही मेवाड़ राज्य को अक्षुण्ण रखा जा सकता था, इस स्थिति को मेवाड़ के सरदारों व प्रजा ने भलीभांति समझ लिया था. इसके अतिरिक्त मेवाड़ की भोगौलिक, व सामरिक स्थिति भी अन्य राज्यों के मेवाड़ पर आक्रमण का कारण थी. गुजरात व मालवा जाने वाले व्यापारिक मार्ग में चित्तौड़ केन्द्र था अतः मार्ग पर अधिकार करने के लिये मेवाड़ पर आक्रमण अवश्यंभावी था.

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इसी स्थिति को ध्यान में रखकर महाराणा उदय सिंह ने मेवाड़ की युद्ध प्रणाली व सैन्य-नीति में व्यापक परिवर्तन किसे. सर्वप्रथम, सन् 1553 ई. में उदयपुर (Udaipur) की स्थापना करके अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया क्योंकि उदयपुर (Udaipur) गिरवा की पहाड़ियों में स्थित है अतः संकट के समय इसे राजधानी के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है. दूसरा, मैदानी युद्ध के स्थान पर पहाड़ों का उपयोग करके छापामार युद्ध प्रणाली का विकास किया. इस युद्ध प्रणाली का प्रयोग कालांतर में मेवाड़ के अन्य महाराणाओं द्वारा भी किया गया. इसी सैन्य नीति का एक महत्वपूर्ण भाग था राज्य के साथ-साथ उसके संघर्ष को दिर्घजीवी रखने के लिये युद्ध में महाराणा व उनके परिवार को सुरक्षित रखना. इसी नीति के कारण सन् 1567-68 ई. में चित्तोड़ पर मुगल आक्रमण के समय मेवाड़ के सरदारों ने महाराणा उदय सिंह द्वितीय व उनके परिवार को युद्ध स्थल से सुरक्षित बाहर निकाल दिया व स्वयं लड़ते हुये वीरगति को प्राप्त हुए. इस आक्रमण के समय चित्तोड़ में अंतिम बार जौहर हुआ.

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महाराणा उदय सिंह कालीन निर्माण

महाराणा उदयसिंह ने उदयपुर (Udaipur) नगर की स्थापना करके राजमहल का निर्माण प्रारम्भ करवाया जिसमें रायआंगण, नीका की चौपाड़, रावला (वर्तमान में कोठार) आदि का निर्माण करवाया. उदयपुर (Udaipur) की सुरक्षा, सिंचाई व पेयजल के उद्देश्य से उदयसागर का निर्माण करवाया. महाराणा के शासनकाल में उदयश्याम मंदिर आदि के भी निर्माण किये गये.

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