Wednesday , 14 April 2021

जल दिवस पर कार्यशाला : पॉलीथिन के जिन्न को बोतल में बंद कीजिए — जल को जहरीला होने से  बचाइए 

उदयपुर (Udaipur). जल स्त्रोतों के प्रदूषण के  प्रमुख कारण पॉलीथिन को जल स्त्रोतों में जाने से रोकने के लिए घर, दूकान, संस्थान  में ही पॉलीथिन को रोकना होगा. इकोब्रिक बनाकर   पॉलीथिन के जिन्न को बोतल में बंद किया जा सकता है.इकोब्रिक  में   पॉलीथिन के बंधन  से पर्यावरण, प्रकृति, मानव समाज और सम्पूर्ण चराचर जगत को एक गंभीर खतरे से बचा सकते है. यह विचार जल विशेषज्ञ डॉ अनिल मेहता ने विद्या पॉलिटेक्निक महाविद्यालय में विश्व  जल दिवस पर आयोजित कार्यशाला में व्यक्त किये. कार्यशाला का आयोजन संस्था की राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई व इको क्लब के तत्वावधान में किया गया.
मेहता ने कहा कि  ईकोब्रिक बनाकर  पॉलीथिन के दैत्य को घर मे ही  एक बोतल में बंद कर दीजिए. जितना पॉलीथिन, सिंगल यूज़ प्लास्टिक घर मे आता है, उसे किसी भी प्लास्टिक की बोतल में ठूंस ठूंस कर जमा करते रहना चाहिए   ताकि यह सड़को पर नही बिखरे, झीलों में नही जाए. पशु इनको  खा कर नही मरे . इस पॉलीथिन, प्लास्टिक भरी बोतल को इकोब्रिक कहा जाता है. इकोब्रिक का रचनात्मक, उत्पादक ( प्रोडक्टिव) उपयोग  दीवार, फुटपाथ, गमले, कचरा पात्र, फर्नीचर से लेकर सड़क निर्माण व सीमेंट निर्माण संयंत्रों की भट्टियों में हो सकता है.  इकोब्रिक से बनी सड़क ज्यादा मजबूत व ड्यूरेबल होती है.
मेहता ने कहा कि जब हम सिंगल यूज़ प्लास्टिक, विशेषकर पॉलीथिन, पाउच इत्यादि को  किसी एक लीटर की प्लास्टिक की ही  बोतल में भर देते है तो हम सौ वर्गफीट क्षेत्रफल  धरती सतह   पर या किसी जल स्त्रोत में फैल जाने वाले पॉलीथिन कचरे को मात्र पौन वर्गफीट  सतही क्षेत्रफल में बंद करते है. एक लीटर की बोतल का सतही क्षेत्रफल लगभग  पौन वर्गफीट होता है.  जब खुले में पॉलीथिन फैलता है तो उसकी  ज्यादा सतह ( सरफेस एरिया) सूर्य व वातावरण के संपर्क में आती है. और यह भूमि, वायु, सतही व भूजल सभी के लिए  प्रदूषण ( पॉल्युशन, कॉंटेमिनेशन) का प्रमुख कारण बन जाता है.
 मेहता ने कहा कि पॉलीथीन में  जहरीले  व विषैले रसायन होते है. पॉलीथिन का   मूल घटक पेट्रोलियम उत्पाद है. पॉलीथिन   को लचीला ( फ्लेक्सिबल), खींच सकने वाला  ( स्ट्रेचेबल), अधिक समय तक  काम मे आ सकने वाला ( ड्यूरेबल), मजबूत,  पारदर्शी  या  रंगीन बनाने एवं इसके सम्पूर्ण प्रदर्शन ( परफॉर्मेंस) को अच्छा बनाने ,  मुलायम, चिकना  हो और अधिक वजन से टूटे नही, इसी प्रकार की  कई विशेषताओं   ( फंक्शनल प्रॉपर्टीज) को विकसित करने के  लिए पॉलीथिन की निर्माण प्रक्रिया के दौरान इसमे  कई    कार्बनिक व अकार्बनिक रसायन मिलाए जाते है.  इनमें   थेलेट्स,  कैडमियम, कोबाल्ट, क्रोमियम, लेड, बीपीए सहित विविध प्रकार के दर्जनों विषैले (टॉक्सिक)  रसायन सम्मिलित है.  यद्यपि पॉलीथिन  नॉन बायो डिग्रेडेबल है  अर्थात जैविक रूप से विघटित नही  होता लेकिन यह फोटोडिग्रेडेबल  अर्थात सूर्य  किरणों, ताप व अन्य वातावरणीय कारकों से इसका  हानिकारक रूप में विघटन होता है.इसमें उपस्थित विषैले रसायन पिघल कर ( लीच होकर) मिट्टी व पानी मे चले जाते है.
 मेहता ने कहा कि भूमि, जल, पौधों, अनाज व फलो को पॉलीथिन  विषाक्त करता है.पॉलीथिन अत्यंत ही बारीक कणों में  टूट  जाता है जिन्हें माइक्रो प्लास्टिक व नेनो प्लास्टिक कहते है. इनका माप  एक मिलीमीटर के एक हजारवें से लेकर  दस लाखवें भाग जितना महीन होता है. खुले मे विसर्जित  पोलेथिन के विषैले रसायन  व माइक्रोप्लास्टिक -नेनो प्लास्टिक कण  मृदा, मिट्टी( सॉइल) की  उपजाऊपन सरंचना, पोषक तत्वों का प्रवाह, लाभदायक मृदा  जीवाणुओं  की संख्या व  गतिविधि सहित  मृदा की मूल प्रकृति को तहस नहस करते है.   ये विषैले तत्व व कण पौधों की जड़ों द्वारा अवशोषित कर लिए जाते है. यही कारण है कि अनाज से लेकर फलों, सब्जियों में अब पॉलीथिन रसायनों का संदूषण है एवं इनमें माइक्रोप्लास्टिक है.
खुले में विसर्जित होने पर इन्हें पशु खा लेते है. जो पशुओं को बीमार तो करते ही है, उनसे मिलने वाले   खाद्य पदार्थ गंभीर रूप से संदूषित ( कोंटामिनेटेड) होते है. इस दृष्टि से निरामिष व सामिष, शाक व मांस दोनों प्रकार के खाद्य पदार्थ जहरीले हो गए है.  गाय के दूध से लेकर प्रसूताओं के दूध सभी मे पॉलीथिन का संदूषण है.
मेहता ने कहा कि जल स्त्रोत -कुंवो, बावड़ियों, नलकूप,  पोखर, तालाब, नदी में जाकर   पॉलीथिन के विषैले रसायन  व  माइक्रोप्लास्टिक कण पानी को प्रदूषित करते है. इससे मछलियों व अन्य जलचरों व जलीय वनस्पति में पॉलीथिन रसायन की मात्रा  खतरनाक स्तर तक  होती जा रही है.  इस प्रकार के जल को पीने से यह समस्त विषैले रसायन व माइक्रोप्लास्टिक कण हमारे शरीर मे जमा हो रहे है.ये रसायन  लिवर, किडनी, पेट के लिए तो कैंसरकारी व मस्तिष्क रोगों के कारक तो है ही, मुख्यतया इनका दुष्प्रभाव  पुरुषों व महिलाओं की प्रजनन प्रणाली ( रिप्रोडक्टिव सिस्टम), अन्तःस्त्रावी ग्रंथि प्रणाली(  एंडोक्राइन ग्लैंड सिस्टम)  व स्नायु तंत्र ( नर्वस सिस्टम)पर पड़ता हैं. ये विषैले रसायन एस्ट्रोजन एक्टिव व एंडोक्राइन डिसरप्टर है. ये हमारे शरीर की प्राकृतिक हॉरमोन व्यवस्था पर दुष्प्रभाव डालते है. फलतः नपुसंकता, बांझपन, जननांगों में विकृति,  स्तन,गर्भाशय व प्रोस्टेट के  कैंसर, बालिकाओं में जल्दी मासिक धर्म आना, किशोरों – युवाओं में अति सक्रियता व मादाओं जैसे लक्षण, थायरोइड संबंधी  व डायबिटीज बीमारियां आम हो गई है.
मेहता ने कहा कि  माइक्रोप्लास्टिक व नेनो प्लास्टिक हमारे श्वसन द्वारा भी शरीर मे प्रवेश कर श्वसन संबंधी रोग पैदा कर रहे है.  यही नही, खुले में विसर्जित हुए  पॉलीथिन प्लास्टिक  से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, मीथेन, इथाइलीन, प्रोपेन  सहित कई विषैली गैसे निकलती है.  ये जलवायु परिवर्तन संकट को और बढ़ाती है व मानव स्वास्थ्य के लिए जहरीली है.जब कचरा स्थलों पर पॉलीथिन अन्य कचरे के साथ जलता है तो फ़्यूरेन, डाईओक्सिन सहित कई विषैली गैस बनती है जो ऊपर वर्णित समस्त रोगों की तीव्रता को बढ़ाती   है    ये विषैली गैसे वनस्पति – पेड़ पौधों को भी गंभीर हानि पहुँचाती  है.पॉलीथिन खुली नालियों, सीवर में जमा होकर  प्रवाह को बाधित करती है.  जमा गंदगी से मच्छरों की समस्या बढ़ बीमारियां बढ़ती है. और, इससे विभिन्न प्रकार की पारिवारिक, सामाजिक व आर्थिक समस्याएं पैदा हो रही है. कार्यशाला में प्रतिभागियों को इकोब्रिक बनाना सीखाया गया. संचालन प्रभारी हेमचंद्र वैष्णव ने किया. हार्दिक कुमार, नितिन सनाढ्य,रमेश कुम्हार ने भी विचार रखे.
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