मैंने अपने नाटक में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया, अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी ने कहा

मुंबई . बालीवुड अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी का कहना है कि उनका नाटक ‘नारी बाई’ बेहद प्रासंगिक है क्योंकि इसका शीर्षक चरित्र परिवर्तन का बीज है. सुष्मिता ने बताया, “मैं उन नारीवादियों में से नहीं हूं जो अपनी किसी बात को साबित करने के लिए अपना अन्तर्वस्त्र जला दें. वर्तमान समय में इसे प्रासंगिक बनाने के लिए मैंने अपने नाटक में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है.

नाटक में मेरा केंद्रीय चरित्र ‘नारी बाई’ का है जो एक कि वेश्या है और परिवर्तन का बीजारोपण करती हैं और इसलिए यह हर समय में प्रासंगिक है. मैं निर्भया मामले या हाल ही में हुए प्रियंका रेड्डी की घटना का जिक्र नहीं करूंगी क्योंकि मेरा मानना है कि हम एक ही ग्रह पर रह रहे हैं. इसी दुनिया में किसी इंसान को ईश्वर के नाम पर मारा जाता है, लैंगिक आधार पर एक महिला को हिसा का सामना करना पड़ता है या जलवायु परिवर्तन के चलते कोई जंगल जल रहा है-ये सारी चीजें हम सभी को प्रभावित करती हैं. इनका एक दूरगामी प्रभाव है.”

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‘करमचंद’ व ‘अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो’ जैसे धारावाहिकों और ‘खलनायक’ व ‘रूदाली’ जैसी फिल्मों में काम कर चुकीं अभिनेत्री ने अपनी बात को जारी रखते हुए आगे कहा, “एक कलाकार होने के तौर पर मैं मानती हूं कि कला को उपदेशात्मक होने की जरूरत नहीं है बल्कि इसे दर्शकों के दिमाग में बदलाव के बीज बोने चाहिए. नाटक में मेरा मुख्य चरित्र एक वेश्या का है जो कि हम सब हैं. हम सभी अपनी जिंदगी का कुछ न कुछ तो बेच ही रहे हैं-शरीर, दिमाग, आत्मा और इस दृष्टि से हम सभी वेश्याएं हैं.”यहां बता दें कि अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी पिछले तीन सालों से अब तक नाटक ‘नारी बाई’ में अपनी प्रस्तुति देती आ रही हैं. इस बीच महिला सशक्तीकरण, लैंगिक समानता, महिलाओं पर हिंसा पर सामूहिक चेतना के साथ कई चीजें बदल गई हैं.

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