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शहादत में भेदभाव नहीं तो फिर नौकरी देने में भेदभाव क्यों ?

1971 से 1999 तक के शहीदों के परिजनों को भी ब्लड रिलेशन के आधार पर नौकरी दे सरकार

झुंझुनू,13 अक्टूबर (उदयपुर किरण). राजस्थान सरकार ने सेना में शहीद हुये सैनिक परिवारों को एक बहुत बड़ा तोहफा दिया है. सरकार ने गत 3 अक्टूबर 2018 को एक अधिसूचना जारी कर 15 अगस्त 1947 से लेकर 1970 तक के दरमियान सेना के तीनो अंगों में शहीद हुये 428 सैनिकों के परिवार के किसी एक सदस्य को राज्य में सरकारी नौकरी देने के आदेश जारी किये गये हैं. इसके तहत निर्धारित अवधि में सेना में शहीद हुये जवानों के खून के रिश्ते के किसी एक सदस्य को नौकरी मिलेगी.

इसमें शेखावाटी के झुंझुनू जिले के 125 व सीकर जिले के 70 शहीदों के आश्रित नौकरी के लिये पात्र होगें. शहीद के खून के रिश्ते में पत्नी, पुत्र, पुत्री, दत्तक पुत्र-पुत्री, पौत्र-पौत्री, दत्तक पौत्र-पौत्री के साथ परिवार में भाई- बहिन को भी नौकरी मिल सकेगी. नि:संदेह इसे राजस्थान सरकार का एक ऐतिहासिक निर्णय कहा जायेगा. आजादी के बाद प्रदेश में कई सरकारे आयी मगर कोई भी सरकार ऐसा निर्णय लेने का साहस नहीं दिखा पायी. सरकार का यह निर्णय शहीदों के प्रति एक सच्ची श्रद्धांजलि मानी जायेगी. सरकार के इस निर्णय से वर्षो से नौकरी पाने के लिये संघर्ष कर रहे शहीदों के परिवारों को एक बड़ी राहत भी मिलेगी.

सरकार द्वारा 1947 से 1970 तक के शहीद परिवारों के परिजनों को नौकरी देने के फैसले के बाद भी कई शहीद परिवार नौकरी पाने से वंचित रह जायेगें. उनकी मांग है कि उन्हें भी अन्य शहीद परिवारों की तरह सरकारी नौकरी दी जाये. देश की हिफाजत में शहीद हुए जवानों के परिजनों की नौकरी में दोहरे मापदंड सामने आ रहे हैं. प्रदेश भर से 1971 से 1999 के बीच शहीद हुए सैंकड़ों परिवारों के परिजनों को आज तक कहीं सरकारी नौकरी नहीं मिली. ऐसे में यही नियम 1970 के बाद शहीद हुए जवानों के लिए भी लागू होने की मांग उठ रही है. तीन अक्टूबर 2018 को राज्य सरकार ने अधिसूचना जारी की. जिसके तहत 15 अगस्त 1947 से 31 दिसम्बर 1970 के बीच शहीद हुए जवान के किसी एक परिजन को ब्लड रिलेशन के आधार पर सरकारी नौकरी देने की घोषणा की गई. जिससे सैंकड़ों शहीदों के परिजनों को नौकरी की उम्मीद बंधी. मगर अधिसूचना में दी अवधि के बाद के शहीदों के परिवारों पर यह नियम लागू नहीं हो रहा. ऐसे में करीब 27 साल के इस दायरे में शहीद हुए जवानों के परिजनों को नौकरी मिलनी मुश्किल हो रही है.

सूत्रों के अनुसार सरकार ने 1971 से शहीद हुए जवानों के किसी एक सदस्य को नौकरी देने के पहले ही आदेश दे दिए थे. मगर यह आदेश 2008 में लागू हो पाए. ऐसे में शहीद के परिवार से नौकरी योग्य परिजन की उम्र पूरी हो चली. हाल ही में जारी अधिसूचना के बाद 1971 से 1999 तक शहीद हुए जवानों के परिजन भी ब्लड रिलेशन के आधार पर किसी एक सदस्य को सरकारी नौकरी दिलवाने की मांग कर रहे हैं. 1947-1970 के बीच शहीद हुए जवानों के परिजनों को ब्लड रिलेशन के आधार पर सरकारी नौकरी देने के नियम का शहीद के परिवारों ने स्वागत किया है. मगर साथ ही इस नियम को 1970 के बाद शहीद हुए जवानों पर भी लागू किए जाने की बात कही है. शहीद परिजनों का कहना है कि शहीद हुए सभी जवानों के लिए नियम एक समान होना चाहिए. शहीद परिजनों की माने तो सरकार ने 1970 के बाद शहीद हुए जवानों के परिजनों को नौकरी देने के आदेश जारी किए थे जो कि 2008 में लागू हो पाए. इस बीच 1971 की लड़ाई में शहीद हुए जवानों के परिजनों की उम्र सरकारी नौकरी पाने की उम्र से पार हो गयी. ऐसे में सरकारी नौकरी के नियम का लगभग शहीदों के परिजनों को कोई फायदा नहीं मिला.

शहीदों के परिजनो ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि सरकार की ओर से 1970 के बाद शहीद हुए सभी जवानों के लिए भी ब्लड रिलेशन का नियम लागू हो तो सैंकड़ों परिवारों को फायदा मिल सकता है. शहीद परिजनों का कहना है कि इस अवधि के जवानों के बहुत से परिजन नौकरी की बाट जोह रहे हैं. 1971 से शहीद हुए जवानों के परिजनों को भी ब्लड रिलेशन के आधार पर नौकरी देने की मांग उठ रही है. बुहाना तहसील के भालोठ गांव की विरांगना विमला देवी ने पति के अलावा बेटा भी देश सेवा में दिया है. एक आंगन से दो-दो शहीद होने के भी सरकारी नौकरी नहीं मिली. वीरांगना विमला ने बताया कि उनके पति धर्मचंद 16 दिसम्बर 71 को फाजिल्का में शहीद हुए. बेटा नरेशकुमार 7 जुलाई 1999 में कारगिल युद्ध में शहीद हुए. शहीद के किसी भी परिजन को नौकरी नहीं मिली है. घर पर कोई कमाने वाला नहीं. ऐसे में परेशानी हो रही है.

उदयपुरवाटी क्षेत्र की भाटीवाड़ पंचायत के बास माना का निवासी शहीद विरांगना संतोष देवी ने बताया कि उनके पति चार दिसम्बर 1971 में शहीद हुए. 2007 में खुद के खर्च पर मूर्ति स्थापना करवाई. नेताओं ने सरकारी नौकरी का खूब आश्वासन दिया. खुद का बेटा नहीं है. ब्लड रिलेशन के आधार पर उसके भी एक परिजन को नौकरी मिलनी चाहिए. बुहाना तहसील के मेहराना निवासी राजेशकुमारी मान ने हिंदुस्थान समाचार को बताया कि उनके पिता पितराम सिंह 13 दिसम्बर 1971 में फाजिल्का (पंजाब) में वीरगति को प्राप्त हो गए थे. उस समय वे महज 20 दिन की थी. वे बीपीएड कर चुकीं हैं. मगर उम्र ज्यादा होने के कारण सरकारी नौकरी नहीं मिली. सरकार को सभी के लिए समान नियम बनाने चाहिए.

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