ब्लैक फंगस के 15 फीसदी संक्रमित कोरोना मरीज नहीं: केंद्र सरकार

नई दिल्ली (New Delhi) . म्यूकर माइकोसिस यानी ब्लैक फंगस के संक्रमण को लेकर रोज नए तथ्य सामने आ रहे हैं. इस संक्रमण के अब तक पता चले रोगियों में से 15 फीसदी से ज्यादा ऐसे हैं जिन्हें कभी कोरोना नहीं हुआ था तथा मधुमेह से संक्रमित लोगों की संख्या महज 55 फीसदी है. यानी बाकी 45 फीसदी को मधुमेह था ही नहीं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने मंत्री समूह की बैठक में यह जानकारी दी. उन्होंने सोमवार (Monday) को बैठक की अध्यक्षता करते हुए बताया कि अब तक 18 राज्यों में ब्लैक फंगस के 5424 मामले सामने आए हैं. इनमें से 4556 मामले ऐसे हैं जिनमें लोगों को पहले कोरोना संक्रमण हुआ था.

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बाकी मामलों में कोरोना नहीं हुआ था. ऐसे मामले 868 बनते हैं. यह कुल मामलों का 15 फीसदी से थोड़ा अधिक है. इन आंकड़ों से साफ है कि जिन लोगों को कोरोना नहीं हुआ था उनमें भी ब्लैक फंगस का संक्रमण हुआ है. उन्होंने यह भी बताया कि ब्लैक फंगस की चपेट में आने वाले 55 फीसदी रोगी मधुमेह से भी ग्रस्त थे. हर्षवर्धन ने बताया कि ब्लैक फंगस के सबसे ज्यादा मामले गुजरात (Gujarat) और महाराष्ट्र (Maharashtra) में मिले हैं. गुजरात (Gujarat) में 2165, महाराष्ट्र (Maharashtra) में 1188, यूपी में 663, मध्य प्रदेश में 590, हरियाणा (Haryana) में 339 और आंध्र प्रदेश (Andra Pradesh)में 248 मामले सामने आए हैं. उन्होंने कहा कि ब्लैक फंगस के उपचार के लिए केन्द्र सरकार ने एंफोटेरिसिन-बी की नौ लाख वायल का ऑर्डर जारी किया है. अगले सात दिन में लगभग तीन लाख वायल उपलब्ध हो जाएंगे. हर्षवर्धन ने बताया कि अब तक 19.6 करोड़ वैक्सीन खुराक दी गई हैं. राज्यों के पास अब भी 60 लाख से अधिक खुराक हैं और 21 लाख खुराक दो-तीन दिन में मिलने वाली हैं.

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बैठक में नागरिक विमानन मंत्री हरदेव पुरी, रसायन उर्वरक राज्यमंत्री मनसुख मंडाविया, स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे मौजूद थे जबकि नीति आयोग के सदस्य वीके पाल डिजिटल रूप से शामिल हुए. औषधि विभाग की सचिव डॉ. अपर्णा ने म्यूकर माइकोसिस के उपचार के लिए दवाओं की बढ़ती मांग के बारे में बताया कि पांच और निर्माताओं को एम्फोटेरिसिन-बी का उत्पादन करने का लाइसेंस दिए गए हैं. उन्होंने यह भी बताया कि निर्माताओं से एक्टिव फॉर्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट- एपीआई का उत्पादन बढ़ाने का आग्रह किया गया है, ताकि दवा का उत्पादन में बाधा उत्पन्न न हो और सुचारू रूप से इसे बढ़ाया जा सके. उन्होंने इन दवाओं के तर्कसंगत उपयोग के लिए प्रचार अभियान चलाने का सुझाव दिया.

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