किसानों की देसी तकनीक इंजीनियरों पर पड़ी भारी, जुगाड़ से बनाई नहर

उदयपुर (Udaipur) . दक्षिणी राजस्थान (Rajasthan)के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र कोटड़ा के 20 किसानों ने अपनी देशी तकनीक के आगे आधु‎निक इंजी‎निय‎रिंग को हरा ‎दिया है. कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते इन ‎किसानों ने अपने खेत में पानी लाने के ‎लिए गैंती-फावड़े का उपयोग कर नहर बना दी. दरअसल, आ‎‎र्थिक ‎स्थि‎ति खराब होने पर इन ‎किसानों पर मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है. लेकिन इनमें हौंसला और जज्बा भरपूर है. यही वजह है कि बिना बिजली, मोटर और सरकारी सहायता के इन गरीब आदिवासियों ने अपने बंजर खेतों तक जुगाड़ से डेढ़ किमी लंबी नहर बना डाली. अब वो बंजर जमीन पर खेती कर रहे हैं. जानकारी के मुता‎बिक, उदयपुर (Udaipur) से 120 किमी दूर कोटडा अंचल के वीर गांव में 20 किसानों के पास करीब 40 बीघा जमीन है. कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते ये लोग ना तो ट्यूबवेल लगवा पा रहे थे और ना बारिश के बाद दूसरी फसल उगा पा रहे थे. ऐसे में इन्होंने खेतों से डेढ़ किमी दूर बहने वाली नदी का पानी खेतों तक लाने की सोची. इसके बाद उन्होंने देसी तकनीक से योजना का खाका तैयार कर वहां से अपने खेतों तक नदी के पत्थरों की मदद से ही एक नहर बना ली. अब ये नदी के पानी से गेहूं और सौंफ की फसल भी उगा रहे हैं.

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‎किसानों के अनुसार, इस गांव में नदी ऊंचाई पर है और उसके आसपास की जमीन कहीं ऊंची तो कहीं नीची है. आदिवासियों ने नदी का पानी खेतों तक पहुंचाने के लिये दो जगह ब्रिज बनाये तो दो जगह जमीन को गैंती-फावड़े से नीचे किया. उसके बाद उस नहर में प्लास्टिक बिछाया. नहर में जब तक पानी बहता है तब तक ना तो प्लास्टिक खराब होता और ना ही फटता है. किसानों ने बताया कि कई बार तेज बारिश में छोटे पत्थर बह जाते हैं और प्लास्टिक फट जाती है. अब वे हर साल बारिश के बाद नहर का मुआयना कर इसमें जरूरी सुधार करते हैं और प्लास्टिक बदलते हैं.

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