मात्स्यकी इंजीनियर में कैरियर: संभावित मासिक वेतन दो से पांच लाख

-डॉ वी. एस. दुर्वे,सेवानिवृत प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष ,सरोवर विज्ञान एवं मातस्यकी विभाग,राज कृषि विश्वविद्यालय

भारत में 8000 किमी. से अधिक की विशाल तट रेखा और 2.3 मिलियन वर्ग किमी. का समुद्री आर्थिक क्षेत्र है. जिसे एक्सक्लुसीव इकॉनॉमिक जोन (EEZ) कहते हैं. यहाँ भारत अकेले ही मछली और खनिज संसाधनों जैसे खनिज तेल, मैगनीज नोड्यूल्स, प्राकृतिक गैस, आयरन-ओर का दोहन एवं उत्पादन कर सकता है. इस आर्थिक क्षेत्र (EEZ) से प्रति वर्ष 3.93 मिलीयन टन मछली उत्पादन की संभावना है. इस विशाल जल क्षेत्र में मछली पकड़ने के लिए, हमें मछली पकड़ने वाले बड़े जहाजों और कई जटिल  उपकरणों की आवश्यकता होती है. इनमें मछली पकड़ने की जालें व इलेक्ट्रानिक उपकरण जैसे इको साउंडर,  सोना (Gold)र, फ़िश फ़ाइन्डर इत्यादि सम्मिलित है. इसी तरह मछली के छोटे- बड़े समुदायों  और उनके आवास की गहराईयों के बारे में जानकारी होना भी जरूरी होता है. मछली के जालों में खास कर ट्रॉलर, पर्ससीनर; लॉन्ग लाइनर आदि बहुत बड़े आकार के होते हैं, और उन्हें चलाना जटिल तकनीकी का काम होता है. ऐसे आधुनिक जहाज़ों को चलाने के लिए सक्षम मातस्यकी इंजीनियर की आवश्यकता होती है. ऐसे मातस्यकी इंजीनियरों को उपर लिखे तकनीकी ज्ञान के साथ मछलियों की किस्मों, उनके भोजन, आदतों और उनकी समुद्र के अन्दर प्रकाश की

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आवश्यकताओं , प्रजनन के मौसम और  संबंधित समुद्र विज्ञान आदि का ज्ञान होना भी आवश्यक होता है. मछली पकड़ने के बड़े यांत्रिक जहाज़  30 हॉर्स पावर से 1000 हॉर्स  पावर शक्ति वाले होते हैं. यह जहाज़ कुछ दिनों  से लेकर एक  साल तक समुद्र के खुले व गहरे पानी में रहते हैं. टूना  मछली पकड़ने के आधुनिक उपकरण और जालें  आजकल बहुत बड़ेहोते हैं. मछली को पकड़ने की लॉग लाइन  नामक  कांटा डोर की लम्बाई 150 कि.मी.से  भी अधिक होती है और कई बार यह  उपकरण (gear)1100 मीटर की गहराई पर संचालित होता है. इसी तरह पर्स सीन नाम की जाल की लम्बाई और चौड़ाई अधिकतम 1440 गुणा 162 मीटर की होती है. ट्रॉल जाल का मुँह कम से कम 20-25 मीटर व्यास  का होता है.यह जाल जब इससे ज्यादा बड़ा होता है तब दो जहाज़ों द्वारा इसका संचालन किया जाता  है.

मातस्यकी  की भाषा में इसे बुल ट्रॉलिंग कहा जाता है और वैज्ञानिक इसे समुद्र का बुल ड्योजर भी कहते है.. ऐसे जालों  को समुद्र में खोलना अथवा  छोड़ना यंत्रों के द्वारा होता है. यह जाल कई घंटे समुद्र में चलते रहते हैं. ये सभी क्रियायें जटिल’होती है. जाल को मछली के साथ जहाज़ पर यंत्रों की सहायता से ही लाया जाता हैं. कभी कभी समुद्र में ऊँची लहरों के कारण जहाज़  अत्यधिक  हिलते  डुलते रहते हैं. ऐसी परिस्थितियों में जहाज को संभालने के लिये धेर्यवान  कुशल, साहसी व शांत स्वभाव के मात्स्यकी इंजीनियर की आवश्यकता होती है. जब पकड़ी हुई मछलियाँ जहाज पर लाई जाती है, तब उनका  वजन कई टन होता है. टूना नामक मछली को ठीक से पकड़ना और प्रोसेस करना कुशलता से ही करना होता है तथा कई बार यह बहुत जोखिमभरा  साबित हो सकता हैं. जहाज पर मछलियों को उनके किस्म के आधार पर अलग-अलग करके प्रशीतक में रखा जाता है, यह काम प्रशीतन इंजीनियर (Freezing Engineer) का होता है. इसलिये प्रशीतन वैज्ञानिक या इंजिनीयर और मात्स्यकी इंजीनियर व जहाज पर कार्यरत सभी कर्मचारियों  में सामंजस्य होना आवश्यक होता है.

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ऐसे मात्स्यकी इंजीनियर को जहाज के आकार पर आधारित 2 से 5 लाख रुपए का मासिक वेतन मिलता है. इसके अलावा कई तरह के भत्ते भी उपलब्ध होते हैं. राजस्थान सहित अन्य राज्यों में ऐसे साहसी व शांत स्वभाव के युवाओं की कमी नहीं है. परन्तु देश में उपलब्ध इस तरह के मत्स्य संबंधित पाठ्यक्रमों की राजस्थान एवं कुछ अन्य राज्यों में पर्याप्त जागरूकता नहीं

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