चिंतन-मनन / अहंकार त्यागने वाले ही महापुरूष होते हैं


बहुत से लोग दिन-रात प्रयास करते हैं कि उन्हें किसी तरह उच्च पद मिल जाए. खूब सारा पैसा हो और आराम की जिन्दगी जियें. जब ये सब प्राप्त हो जाता है तो इसे ईश्वर की कृपा मानने की बजाय अपनी काबिलियत और धन पर इतराने लगते हैं. जबकि संसार में किसी चीज की कमी नहीं है. अगर आप धन का अभिमान करते हैं तो देखिए आपसे धनवान भी कोई अन्य है. विद्या का अभिमान है तो ढूंढ़कर देखिए आपसे भी विद्वान मिल जाएगा. इसलिए किसी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए. जो लोग अहंकार त्याग देते हैं वही महापुरूष कहलाते हैं. महाभारत में कथा है कि दुर्योधन के उत्तम भोजन के आग्रह को ठुकरा कर भगवान कृष्ण ने महात्मा विदुर के घर साग खाया. भगवान कृष्ण के पास भला किस चीज की कमी थी. अगर उनमें अहंकार होता तो विदुर के घर साग खाने की बजाय दुर्योधन के महल में उत्तम भोजन ग्रहण करते लेकिन कृष्ण ने ऐसा नहीं किया.

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भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाये जबकि लक्ष्मण जी ने जूठे बेर फेंक दिये. यहीं पर राम भगवान की उपाधि प्राप्त कर लेते हैं क्योंकि उनमें भक्त के प्रति अगाध प्रेम है, वह भक्त की भावना को समझते हैं और उसी से तृप्त हो जाते हैं. अहंकार उन्हें नहीं छूता है, वह ऊंच-नीच, जूठा भोजन एवं छप्पन भोग में कोई भेद नहीं करते. शास्त्रों में भगवान का यही स्वभाव और गुण बताया गया है. महात्मा बुद्घ से संबंधित एक कथा है कि एक बार महात्मा बुद्घ किसी गांव में प्रवचन दे रहे थे. एक कृषक को उपदेश सुनने की बड़ी इच्छा हुई लेकिन उसी दिन उसका बैल खो गया था. इसलिए वह महात्मा बुद्घ के चरण छू कर सभा से वापस बैल ढूंढने चला गया. शाम होने पर कृषक बैल ढूंढ़कर वापस लौटा तो देखा कि बुद्घ अब भी सभा को संबोधित कर रहे हैं.

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भूखा प्यासा किसान फिर से बुद्घ के चरण छूकर प्रवचन सुनने बैठ गया. बुद्घ ने किसान की हालत देखी तो उसे भोजन कराया, फिर उपदेश देना शुरू किया. बुद्घ का यह व्यवहार बताता है कि महात्मा बुद्घ अहंकार पर विजय प्राप्त कर चुके थे. बुद्घ के अंदर अहंकार होता तो किसान पर नाराज होते क्योंकि बैल को ढूंढ़ने के लिए किसान ने बुद्घ के प्रवचन को छोड़ दिया था. शास्त्रों में अहंकार को नाश का कारण बताया गया है इसलिए मनुष्य को कभी भी किसी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए.

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