देश बेचू बजट : रघु ठाकुर


केन्द्र सरकार का वर्ष 2020 का बजट ऐसे समय आया है, जबकि एक तरफ सी.ए.ए. को लेकर शाहीन बाग में हिंसा और गोलियों की धमक तो दूसरी तरफ दिल्ली विधानसभा चुनाव के शोर के बीच बजट की चर्चा लगभग दबकर रह गई. और जिससे उसकी ज्यादा चर्चा नहीं हो सकी. वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने 2 घंटे 40 मिनिट तक बजट भाषण पढ़ा और यहाँ तक की बीच में वह कुछ अस्वस्थ भी हुई, अच्छा हुआ कि गडकरी जी की भेजी गई चॉकलेट से वे संभल गई परन्तु इससे बजट नहीं संभलता. यह भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है कि इस बार के बजट के प्रति आम लोगों में कोई दिलचस्पी नज़र नहीं आई. ऐसा लगा कि, लोग आश्वस्त थे कि बजट से उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा.

आमजन की आकांक्षाओं के अनुरूप बजट लगभग निराकार बजट रहा. बजट भाषण का दो तिहाई हिस्सा तो केवल शेर-शायरी और प्रस्तावना के पाठ में चला गया, शेष में भी आमजन के लिए लगभग कुछ नहीं है. इस बार बजट पर जे.एन.यू. की बौद्धिक लावी की तरफ से भी कोई तीखी या विशेष प्रतिक्रिया नहीं आई. यह जे.एन.यू. की एकजुटता की वजह से है, या हताशा की वजह से, यह कहना कठिन है. तथ्य केवल यह है कि, श्रीमती निर्मला सीतारमण भी जे.एन.यू. की प्रोडक्ट है, और शायद इसी योग्यता की वजह से प्रतिपक्ष के आरोपों को खंडित करने के लिए उन्हें वित्त मंत्री पद से नवाजा गया है. बजट में महँगाई को रोकने के लिए उपाय तो दूर की बात है महँगाई की चर्चा तक नहीं हुई, जबकि महँगाई का चक्र बराबर बढ़ता चला जा रहा है. डॉ. लोहिया कहते थे कि, हमारे देश में आमदनी बढ़ती है गधे की चाल से, और महँगाई दौड़ती है घोड़े की चाल से. डॉ. लोहिया द्वारा 60 साल पहले कहा गया यह कथन आज भी सत्य नज़र आता है. महँगाई के प्रति तो एक प्रकार से देश भी तटस्थ जैसे हो गया है. जो मानने लगा है कि सरकारें महँगाई बढ़ाने को होती है, तथा इसका इलाज संभव नहीं है.

किसानों के लिए भी कोई योजना इस बजट में नहीं है न दाम तय करने की नीति और न ही विचोलियों से उन्हें बचाने की नीति. दोनों पर ही यह बजट खामोश है. किसानों के लिए बस एक आश्वासन का कोरा लिफाफा भर है. जिसमें लिखा गया है कि, 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करने का प्रयास किया जायेगा. वैसे यह बात सरकार पिछले 2 वर्षें से कहती आ रही है, और अब तो हद हो गई कि बजट एक वर्ष का और वायदा है 3 वर्ष का. शायद इसलिए कि 2022 इस सरकार का चौथा वर्ष होगा इसके बाद चुनावी वर्ष आ जाएगा, तब कोई नया पुलवामा या शाहीन बाग जैसे मुद्दे फिर पैदा किये जाएंगे, और जिससे सीधे थोक बंद वोटो की फसल काट ली जायेगी. किसान को मिलने वाले मूल्य और उपभोक्ता के द्वारा क्रय मूल्य के बीच की खाई को पाटने की कोई चर्चा इस बजट में नहीं है. जिस प्याज को पैदा कर किसान 2-3 रूपये के भाव में उसे बेच देता है वही प्याज कुछ समय पश्चात्् बाजार में 150 रूपये किलो तक बिकती है, इस पर बजट भी मौन है, सरकार भी मौन है, और प्रतिपक्ष भी मौन है. किसानों की आय दुगनी कैसे होगी इसके लिए क्या उपाय किए जायेंगे, इस पर भी सरकार मौन है.

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कर्मचारी और मध्य वर्ग के लिए आयकर की छूट के नाम पर एक जाल डाला गया है. पहली बार सरकार ने आयकर की छूट पर दो समान्तर स्लैब तैयार किए है, एक में वे पुराने लगभग 100 कर छूट के मुद्दे है, जिन्हें दशकों से फिंज्र वेनीफिट के नाम से दिया जा रहा है, इसके अन्य विकल्प के प्रस्ताव के रूप में आयकर छूट की सीमा 2.5 से बढ़कर 5 लाख करने का प्रस्ताव है. अब यह कर दाता को चुनना है कि, वह पुरानी छूट चाहते है, या नई छूट. अगर पुरानी छूट चाहेंगे तो ढाई लाख रूपये आय के बाद आयकर लगेगा और पुरानी छूट नहीं चाहिए तो 5 लाख रूपये तक की राशि आयकर मुक्त होगी. याने कुल मिलाकर स्थिति जस की तस है. अगर रियायतों को छोड़ते है तो रियायतों की राशि 5 लाख तक की आय के कर के लगभग बराबर हो जाती है, और 5 लाख रूपये की आयकर छूट का विकल्प चुनते है, तो फिर रियायतों को छोड़ना होगा. सरकार ने आम मध्यवर्ग कर्मचारियों के लिए विकल्प दे दिया है कि चाहे बायीं या दायीं जेब कटाओं पर जेब कटानी होगी.

सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को बेचने के निर्णय को और अधिक स्पष्ट कर दिया है. जीवन बीमा निगम जो लगभग 5 दशकों से आम आदमी के लिए जीवन की सुरक्षा और भविष्य के लिए जमा की सेवाएं दे रहा था, अब इस संस्था को खुले बाजार में बेचने का ऐलान सरकार ने संसद में कर दिया है, इसमें न केवल देशी बल्कि विदेशी पूँजी निवेश भी हो सकेगा और जो विदेशी कम्पनियां बीमा करने आएगी वे जब आम और गरीब आदमी का पैसा लेकर भागेगी तब इन गरीबों की पूँजी भी लुट जाएगी. कृषि के क्षेत्र में पिछले वर्ष के अनुभव हमारे सामने है.

छ.ग. में कृषि बीमा के लिए देशी कम्पनी आई थी जिसमें अंबानी शामिल थे, किसानों से प्रीमियम का पैसा ले लिया गया परन्तु जब किसान पर विपदा पड़ती है तो उसे नियमानुसार वापिस नहीं किया गया. यहाँ तक कि, बस्तर के आदिवासी जिनकी गरीबी व शोषण को सरकारें आए दिन बेचती है, उनका भी पैसा लेकर कम्पनियां चली गई और अब हालात यह है कि, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव व अंबानी तो दूर उनके कर्मचारी भी नहीं आते. वे जानते है कि देश की सरकारे निर्वाचित लोग नहीं चला रहे है बल्कि उनके मालिक व उनका नाम चला रहे है. वैसे भी अंबानी बन्धुओं पर सभी सरकारें मेहरबान है, चाहे वह केन्द्र की भाजपा सरकार हो या म.प्र. की कमलनाथ की कांग्रेस सरकार हो.

अगर केन्द्र के इशारे पर उन्हें पब्लिक सेक्टर को छोड़कर बगैर योग्यता के राफेल का काम मिल जाता है तो म.प्र. भी पीछे नहीं है, और उनके 450 करोड़ रूपया के बकाया चुकाने के लिए किस्त बाँध देता है. अंबानी की तिजोरियों से सभी सरकारें उपकृत है, चाहे वह भाजपा हो या कांग्रेस. आश्चर्य की बात है कि, पूँजीपतियों को सैल्यूट करने पर हिन्दू या मुसलमान दोनों शांत रहते है, और दोनों को गुस्सा नहीं आता. एयर इंडिया जो सरकारी विमान कम्पनी है को बेचा जा रहा है, और देश के पुराने वित्तमंत्री एवं वर्तमान में रेल मंत्री श्री पीयुष गोयल बेशर्मी से बयान देते है कि अगर मैं मंत्री नहीं होता तो स्वत: एयर इंडिया की बोली लगाता. यह कितना विचित्र है, कि जेट एयर वेज जो निजी विमान कम्पनी जब घाटे में जाती है, तो भारत सरकार अपनी जनता के पैसे से उसे बचाने के नाम पर दस हज़ार करोड़ रूपये की राशि या सुविधाएं देती है, और उसे सरकार के अधीन लाने की पहल करती हैं, याने खेल साफ है कि निजी उद्योगपतियों के द्वारा दूध चूस कर अधमरी गाय को जनता के पैसे से सरकार पालेगी और दूधारू गाय को जनता के अधिकार से छीनकर पूँजीपतियों को सौंप देगी.
रेलवे का निजीकरण अघोषित रूप से घोषित कर दिया गया है.

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150 तेजस गाड़ियां चलायी जाएगी और रेलवे के द्वारा चलायी जा रही एक्सप्रेस और सुपरफास्ट गाड़ियों का वह स्थान ले लेगी. जिनका किराया वर्तमान किराए से देढ़ से दो गुना होगा. तेजस गाड़ियों को निकालने के लिए शताब्दी जैसी महत्वाकांक्षी गाड़ियों को रोका जाएगा. बम्बई से अहमदाबाद के बीच गाड़ी को रोक कर तेजस को रास्ता दिया जाएगा और कहा जाएगा कि तेजस की रतार कितनी अच्छी है. 350 स्टेशनों को प्रबंधन के लिए निजी हाथों में देना है, और इसका परिणाम यह होगा कि आम आदमी के लिए रेलवे स्टेशन प्रधानमंत्री निवास जैसे सुरक्षित बन जाएंगे. भोपाल के हबीबगंज स्टेशन पर 4 पहिया वाहन का पार्किंग शुल्क 24 घंटे का 400 रूपये होता है, आधारभूत ढांचा वो चाहे रेलवे का हो या हवाई अड्डा का उसे सरकार बनाएगी पर उस पर निजी विमान और रेल गाड़ियां दौड़ेगी. क्या सरकार के पास इसका कोई उत्तर है? कि जब विमान और रेल आपको चलाना है, तो हवाई अड्डा के विकास, रेलवे की विद्युतीकरण ढांचे पर हज़ारों करोड़ों रूपये सरकार खर्च क्यों कर रही हैं? उनके निर्माण के टेन्डर निजी उद्योगपति क्यों नहीं लेते? क्योंकि उसमें पूँजी लगाना है, और विमानों व रेलों से पूँजी कमाना है.

शिक्षा के लिए भी सरकार के पास बस एक ही कल्पना है कि धीरे-धीरे उसे बाजार की वस्तु बनाओ और खरीददार की क्षमता पर ले जाओ. आयुष्मान योजना से गरीब को कितना लाभ पहुँचा है, और निजी अस्पतालों ने कितना पैसा कमाया है, इसका आंकड़ा चौकाने वाला होगा. सच्चाई तो यह है कि आयुष्मान योजना से बड़ी संख्या में निजी अस्पताल मालामाल हो रहे, बल्कि चिकित्सा खर्च के नाम के भ्रष्टाचार का भारी विकास हो गया है. निजी अस्पताल मनमाने बिल बनाकर लूट रहे हैं. कार्पेरेट टैक्स में बड़ी कटौती की गई है. खाद पर दी जाने वाली रियायत को सीमित किया जा रहा है, याने सुविधा को क्रमश: खत्म करने की तैयारी हैं. इससे जब पैदावार कम होगी तो जाहिर है कि विदेशों से खाधान का आयात होगा और डब्लू.टी.ओ. के समझौते का पालन होगा.

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ऑनलाईन शिक्षा के नाम पर सरकार की शिक्षा की जवाबदारी क्रमश: समाप्त हो जाएगी और लाखों शिक्षक बेरोजगार हो जाएंगे. नये उद्योग को टैक्स में बड़ी छूट दी गई है. परन्तु यह भुला दिया गया है कि देश के 22 करोड़ छोटे किसान मजदूर, 32 करोड़ बेरोजगार अर्ध बेरोजगार, उद्यमी नहीं बन सकते. इनके पास 5 करोड़ तो दूर 5 लाख की पूँजी नहीं है, निजी मेडीकल कॉलेज और विश्वविद्यालय पहले से थे अब पी.पी.पी. मॉडल पर मेडीकल कॉलेज और विश्वविद्यालय खुल गये. याने शिक्षा, चिकित्सा के लिए सम्पूर्णत: निजी हाथों में देने का मार्ग प्रशस्त कर दिया गया है. शिक्षा के क्षेत्र में भी विदेशी पूँजी को रास्ता दे दिया गया है.

विदेशी कम्पनियों को डेटा सेंटर बनाने की मंजूरी दी गई है, पर इसके सामाजिक प्रभाव क्या होंगे इस पर कोई विचार नहीं किया गया. कम्पनियों के अंशधारकों को जमीनों पर टैक्स लगाकर देशी पूँजी को पीछे धकेल दिया गया है. तथा अंश पूँजी से चलने वाले उद्योग की पूँजी को घटाकर बड़ी-बड़ी राक्षसी पूँजी वाले कारखानों के मुकाबले खड़ा करने की तैयारी है. जिसके परिणामस्वरूप अंश पूँजी से बने हुए कारखाने भी क्रमश: समाप्त होंगे, और शेयर को खरीद कर बचत और आमदनी को बढ़ाने वाले आम आदमी आंशिक पूँजी लगाना बंद करेंगे. सरकारी कारखानों के हिस्सों के बेचने को सरकार की आय बताया जा रहा है. संपत्ति को बेचना और उसे आय मानना इससे बद्तर कल्पना क्या हो सकती? आई.डी.बी.आई. बैंक की 46 प्रतिशत हिस्सेदारी को सरकार बेचेगी.

बिजली के प्रीपेड स्पाट मीटर बदलने पर बड़ी राशि खर्च होगी, बिजली मिले न मिले परन्तु बिल सुरक्षित मिलता रहेगा. सेना का बजट बढ़ गया परन्तु इसका अधिकांश हिस्सा केवल हथियारों की खरीद पर खर्च हो रहा है, जबकि सी.ए.जी. की रिपोर्ट के अनुसार सियाचिन में तैनात सैनिकों को न उपयुक्त खाना मिल रहा, न कपड़े, न उपकरण इस कारण से सैनिकों का स्वास्थ बिगड़ रहा है. कुल मिलाकर यह बजट देश बेचू बजट है, याने राष्ट्रीय संपत्ति को बेचकर बनने वाला बजट. मैंने तो कहा कि वित्त मंत्री जी ने इतना लम्बा भाषण पढ़ने की कसरत बैठकर की उनका पूरा बजट तो केवल कविता में समाहित हो सकता था.
कुल तो पहले बेच दिया है, बचा खुचा अब बेचेंगे.
सारे कुछ का निजीकरण कर अब चैन से घूमेंगे.
देश की संजीवनी एक दवाई, हर जगह लाओ एफ.डी.आई..
जिनने हमें चुनाव जिताया, वहीं हमारे माई बाप.
धर्म हमारा मालिक सेवा, जिसने हमें यहाँ पहुंचाया.
मरे किसान व बेरोजगार, अपने ऊपर पूँजी की छाया.
नहीं किसी से लेना देना, अपना तो बस एक ही कहना.
चाहे जो होने दो, हमें तो बस सत्ता में रहना.

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