चिंतन-मनन / सुख के स्वभाव में डूबो


लगता है, आदमी दुख का खोजी है. दुख को छोड़ता नहीं, दुख को पकड़ता है. दुख को बचाता है. दुख को संवारता है; तिजोरी में संभालकर रखता है.
दुख का बीज हाथ पड़ जाए, हीरे की तरह संभालता है. लाख दुख पाए, पर फेंकने की तैयारी नहीं दिखाता. जो लोग कहते हैं आदमी आनंद का खोजी है, लगता है आदमी की तरफ देखते ही नहीं. आदमी दुखवादी है, अन्यथा संसार इतना दुख में क्यों हो! अगर सभी लोग आनंद खोज रहे हैं, तो संसार में आनंद की थोड़ी झलक होती. कुछ को तो मिलता! और कुछ को मिल जाता तो वे बांटते औरों को भी; तो कुछ झलक उनकी आंखों और उनके प्राणों में भी आती. अगर सभी आनंद की तलाश कर रहे हैं, तो लोग एक-दूसरे को इतना दुख क्यों दे रहे हैं.

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और ऐसा नहीं कि पराए ही दुख देते हों, अपने भी दुख देते हैं. अपने ही दुख देते हैं! शत्रु तो दुख देते ही है; हिसाब रखा है, मित्र कितना दुख देते हैं? जिन्हें तुमसे घृणा है, वे तो दुख देंगे, स्वाभाविक; लेकिन जो कहते हैं तुमसे प्रेम है, उन्होंने कितना दुख दिया, उसका हिसाब रखा है? और अगर हर आदमी दुख दे रहा है, तो एक ही बात का सबूत है कि हर आदमी दुख से भरा है. हम वही देते हैं, जिससे हम भरे हैं. वही तो हमसे बहता है जो हमारे भीतर लगा है. हमारे व्यवहार से दूसरों को दुख मिलता है, क्योंकि हमारे भीतर कड़वाहट है. हम लाख कहें हम प्रेम करते हैं, लेकिन प्रेम के नाम पर भी हम दूसरों के जीवन में नरक निर्मित करते हैं. पति-पत्नियों को देखो, मां-बाप को देखो; बेटे-बच्चों को देखो- सब एक-दूसरे की फांसी लगाए हुए है. ऐसा है. क्यों? और सभी कहते हैं कि हम सुख को खोजते हैं.

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मेरे पास रोज लोग आते हैं, जो कहते हैं: हम सुख चाहते हैं. अगर तुम सुख चाहते हो तो कोई भी बाधा नहीं है; सुख तो लुट रहा है. सुख तो चारों तरफ मौजूद है. गंगा सामने बहती है और गंगा के लिए तो चाहे दो कदम भी उठाना पड़े, सुख तो उससे भी करीब है. सुख तो तुम्हारा स्वभाव है. डूबो इस स्वभाव में. जिन्होंने भी कभी आनंद पाया है, उन्होंने एक बात निरंतर दोहराई है कि आनंद तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है. तुम जिस दिन तय कर लोगे कि आनंदित होना है, उसी क्षण आनंदित हो जाओगे. फिर एक पल की भी देरी नहीं है. देरी का कोई कारण नहीं है.

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