श्रमिकों की कमी के चलते कंपनियां दे रही मुफ्त खाने और हवाई टिकट का प्रस्ताव


नई दिल्ली (New Delhi). वैश्विक महामारी (Epidemic) कोरोना (Corona virus) के चलते लॉकडाउन (Lockdown) के कारण श्रमिक वर्ग को शहरों में दो जून की रोटी के लाले पड़ गए थे और उन्हें अपने गांवों का रुख करना पड़ा था. अब लॉकडाउन (Lockdown) में ढील से शहरों में आर्थिक गतिविधियां पटरी पर लौट रही हैं लेकिन मजूदरों की कमी से कारोबारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. मजदूरों को वापस शहर लाने के लिए कई तरह के प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं. साथ ही कंपनियां अपनी श्रम नीति की भी समीक्षा कर रही हैं. कुछ कंपनियां मजदूरों को मुफ्त आने-जाने, ठहरने और भोजन की पेशकश कर रही हैं. वहीं कुछ कंपनियां आसपास के इलाकों से नए लोगों को भर्ती कर रही हैं. कुछ कंपनियां ये दोनों काम कर रही हैं.

ऑस्ट्रेलिया के लिनफॉक्स ग्रुप की यूनिट लिनफॉक्स लॉजिस्टिक्स इंडिया लिमिटेड के कंट्री मैनेजर वीवी वेणुगोपाल कहते हैं, हम मजदूरों को वापस साइट पर लाने के लिए खाना और दूसरे इनसेंटिव दे रहे हैं. प्रवासी मजदूरों की वापसी में संभावित देरी की भरपाई के लिए कंपनी नए लोगों को भी प्रशिक्षण दे रही है. साथ ही मजदूरों को लाने ले जाने के लिए बसों का भी इंतजाम किया जा रहा है. लॉकडाउन (Lockdown) की शुरुआत में मजदूरों को उनके ठिकानों पर ही रोकने की कोशिश की गई. लेकिन लॉकडाउन (Lockdown) बढ़ने से उनके सामने खाने पीने का संकट खड़ा हो गया और वे पैदल ही अपने गांवों की तरफ कूच करने लगे. मजबूर होकर सरकार (Government) को उनकी वापसी का प्रबंध करना पड़ा.

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नेशनल रियल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल की महाराष्ट्र (Maharashtra) यूनिट के प्रेजिडेंट राजन बंदेलकर ने कहा, ‘मजदूरों की कमी से कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स का काम प्रभावित हुआ है जिससे इनके पूरा होने में थोड़ी देर होगी.’ उन्होंने कहा कि उनकी संस्था मजदूरों को वापस लाने की कोशिश कर रही है. इसके लिए उन्हें हवाई टिकट की भी पेशकश की जा रही है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मार्च में मजदूरों और किसानों के लिए मुफ्त खाद्यान्न, ईंधन और नकद ट्रांसफर की घोषणा की थी. साथ ही उन्हें तीन महीने तक गांवों में रोजगार देने का भी वादा किया गया था. पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुफ्त खाद्यान्न योजना को नवंबर तक बढ़ाने की घोषणा की. सरकार (Government) की तरफ से मिल रही सुविधाएं की मजदूरों को गांवों में रोके रखने की वजह नहीं हैं. गांवों में रहकर उन्हें किराया नहीं देना पड़ रहा है जिससे उन्हें भारी बचत हो रही है. शहरों में इन मजदूरों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है.

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देश की सबसे बड़ी स्टाफिंग कंपनियों में से एक टीमलीज सर्विसेज लिमिटेड में इंडस्ट्रियल मैन्यूफैक्चरिंग एंड इंजीनियरिंग के बिजनेस हेड सुदीप सेन ने कहा कि इन सुविधाओं के अभाव में मजदूर आखिर शहरों का ही रुख करेंगे. हालांकि मजदूरों को वापस लाने के कंपनियों की कोशिशें कुछ रंग ला रही हैं. मीडिया (Media) रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) और बिहार (Bihar)से आ रही ट्रेनें खचाखच भरी हुई हैं. अधिकांश मजदूर इन्हीं दो राज्यों के हैं. सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकनॉमी के मुताबिक देश में जून में बेरोजगारी की दर घटकर 11 फीसदी रह गई जो अप्रैल और मई में 23 फीसदी के आसपास थी. फैक्ट्रियों के खुलने के बाद कुछ मजदूर शहरों में वापस आए हैं और साथ ही सरकार (Government) ने मनरेगा का बजट बढ़ाया है. मनरेगा के तहत 202 रुपये की मजदूरी और साल में 100 दिन काम मिलता है. मोदी सरकार (Government) ने इसके लिए आवंटन 40 हजार करोड़ रुपये बढ़ा दिया है. सदर्न प्लाईवुड ग्रुप कंपनी के संस्थापक एमके हंस ने कहा, मेरे पास विभिन्न प्लांट में 500 से ज्यादा मजदूर थे. जो वापस आना चाहते हैं, मैं उन्हें खाना और अन्य इनसेंटिव देने को तैयार हूं.

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