लद्दाख में कैसा रहेगा चीन का आक्रामक खेल

नई दिल्ली (New Delhi) . भारतीय वायु सेना के एक बड़े अधिकारी के अनुसार पूर्वी लद्दाख और अक्साई चिन क्षेत्र में भारी हथियारों और मिसाइलों के अलावा वास्तविक नियंत्रण रेखा एलएसी में कम से कम 50,000 पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पीएलए के सैनिकों की तैनाती न केवल चीन पर रूसी प्रभाव का संकेत है बल्कि युद्ध की योजना भी है. अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर चीन की स्थिति और युद्ध योजना के बारे में बात करते हुए कहा कि अगर चीन अक्रामक होता है तो तोपखाने और रॉकेट के एक बैराज के तहत आगे बढ़ने वाले सैनिकों को शामिल करने की संभावना हो सकती है.

अधिकारी ने बताया यह युद्ध लड़ने का पुराना सोवियत तरीका है, जिसमें सैनिक गहराई वाले क्षेत्रों में रहते हैं इस मामले में वास्तविक नियंत्रण रेखा से 320 किलोमीटर दूर हॉटन एयरबेस और वायु-रक्षा उन्हें कवर प्रदान करती है. जबकि कई रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना ​​है कि भविष्य के किसी भी युद्ध को स्टैंड-ऑफ हथियारों से लड़ा जाएगा जो भारतीय सेनानियों को जमीन पर रहने के लिए मजबूर करेगा. अधिकारी ने कहा कि भारतीय वायुसेना की “फैलाने, अवशोषित करने, दोबारा प्राप्त करने और प्रतिकार करने की रणनीति को चीन की योजनाओं को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त बार दोहराया गया है.

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उन्होंने बताया कि भारतीय वायुसेना की प्रतिक्रिया पीएलए वायु सेना की तुलना में तेज है. जो कि हॉटन, ल्हासा या कशगर जैसे वायु ठिकानों से एलएसी की दूरी के कारण है और यह कि पीएलए की सतह से हवा में मार करने वाली स्थल कमजोर हो जाती हैं. वो बताते हैं एक बार जब एयर-डिफेंस मिसाइल सिस्टम बाहर निकलता है, तो तिब्बती रेगिस्तान पर बने हुए तोपखाने, रॉकेट और टुकड़ी की सांद्रता उजागर हो जाती है. जहां इन प्रणालियों के लिए कोई प्राकृतिक छलावरण नहीं है. भारत-चीन शत्रुता को वैश्विक हस्तक्षेप के बिना 10 दिनों से अधिक तीव्र स्तर पर जारी रखने की संभावना नहीं है अधिकारी ने ये भी समझाया कि देशी गोला बारूद 40 दिनों के लिए और पारंपरिक बम 60 दिनों के लिए उपलब्ध है.

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चार से पांच राफेल विमानों पर पायलट फ्रांस में प्रशिक्षण ले रहे हैं और अगले महीने अंबाला स्क्वाड्रन में शामिल होने के लिए तैयार हैं और एक नया लद्दाख वाहिनी कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल पीजीके मेनन, दोनों सेनाओं को समान रूप से मैच करते हुए भी दिखाई दे रहे हैं. मई की शुरुआत में शुरू हुए तनाव में भारतीय और चीनी सैनिक एलएसी के साथ कई बिंदुओं पर आमने-सामने आ गए हैं. इनमें से कुछ क्षेत्रों में विशेष रूप से फिंगर एरिया और डेपसांग में, भारतीय बलों को उन बिंदुओं से हटा दिया गया है. जहां वे पहले गश्त कर सकते थे.लेकिन अब भारतीय सेना ने झील के दक्षिणी तट पर मौजूद रिगललाइन स्थितियों को नियंत्रित किया है जो इसे पूरी तरह से क्षेत्र में हावी होने और चीनी सैन्य गतिविधि पर नज़र रखने में मदद करती हैं. भारतीय सेना ने पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट पर फिंगर 4 रिगलाइन पर पीएलए की तैनाती को देखते हुए प्रमुख ऊंचाइयों पर भी नियंत्रण कर लिया है. जहां प्रतिद्वंद्वी सैनिकों को एक-दूसरे से लगभग सौ मीटर की दूरी पर तैनात किया जाता है.

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