Sunday , 22 September 2019
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समाज में संतुलन स्थापित करने के लिए होता है ईश्वर का मनुज अवतार

(श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, 24 अगस्त पर विशेष) चन्द्र प्रकाश

मान्यता है कि भादो मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्य रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था. वे अपने माता-पिता की आठवीं संतान थे. जन्म के समय उनके माता-पिता वसुदेव और देवकी तत्कालीन राजा कंस के कारागार में कैद थे. कंस मथुरा का राजा था और बड़ा अत्याचारी था. वह अग्रसेन का पुत्र और देवकी का भाई था. उसने अपने पिता को कैद कर लिया था और मथुरा का शासक बन गया था. बताया जाता है कि एक दिन आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस का वध करेगी. इसके बाद से ही कंस अपने बहन-बहनोई का दुश्मन बन गया. इन दोनों से सात संतानें हुईं. उन सभी को कंस ने पटक-पटक कर मार दिया. आठवां नंबर श्रीकृष्ण का था.लेकिन ईश्वर की लीला के आगे कंस की एक न चली. वह चाह कर भी कृष्ण का बाल बांका न कर सका और अंत में उन्हीं के हाथों मारा गया. अति संक्षिप्त रूप में श्रीकृष्ण के जन्म की कथा बस इतनी ही है. हां, जब विस्तार में जाएंगे तो वही बात होगी की ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’. इस प्रकार हम हर वर्ष इस तिथि को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं. यह परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है.

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सवाल उठता है कि आखिर ईश्वर का मानव के रूप में धरती पर आना क्यों होता है? भगवान को क्या गरज पड़ी है कि वे अपना वैभव छोड़कर हम मनुष्यों के बीच तमाम कठिनाईयों को झेलें. गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में भगवान श्रीराम कहते हैं कि ‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ यानी सृष्टि की उत्पति और मानव समाज की रचना स्वत: नहीं हुई, बल्कि ईश्वर ने सोच-समझकर इस कार्य को अंजाम दिया है. इस लिहाज से यह सृष्टि और हमारी धरती प्रभु का घर है. जब हम अपने छोटे से घर-परिवार को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए दिन-रात एक किए रहते हैं तो क्या परमात्मा अपने घर-समाज के लिए नहीं सोचता होगा?

ईश्वर के अवतार के कई कारण बताए गए हैं. लेकिन मूलत: इसके पीछे सृष्टि और समाज के संतुलन का तथ्य ही निहित है. स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गीता के उपदेश में कहते हैं कि ‘यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं, परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम, धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे’. इसी को गोस्वामी जी कहते हैं कि ‘जब-जब होई धरम के हानी, बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी, तब-तब प्रभु धरि मनुज शरीरा, हरहिं दयानिधि सज्जन पीरा’. कहने का आशय यह है कि जब-जब धरती पर असंतुलन बढ़ जाता है, तब-तब प्रभु का मानव के रूप में अवतार होता है.

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अब यहां इस बात को समझना होगा कि इस संतुलन-असंतुलन का तात्पर्य क्या है. शास्त्रों में तीन प्रकार की योनियां बताई गई हैं. देव, दानव और मानव. इसी प्रकार इनकी प्रवृति भी बताई गई है. वैसे गीता में दो प्रकार की ही शक्तियों का वर्णन है. एक दैवीय और दूसरी आसुरी. हिंदू धर्म शास्त्र देव और दानवों के बीच अनेकानेक युद्ध कथाओं से भरे पड़े हैं. शास्त्रों में कहा गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति के देवता ब्रह्मा समान रूप से देव और दानव योनियों में जीवों को पैदा करते हैं, ताकि सृष्टि का संतुलन कायम रहे. फिर गड़बड़ कहां होती है. जिससे सृष्टि और समाज में असंतुलन पैदा हो जाता है.

दरअसल, धरती पर जीवों के उत्पन्न होने के बाद से ही गड़बड़ी शुरू हो जाती है. यह समस्या पुरातन है. जब समाज में आसुरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ जाता और दैवीय शक्तियां क्षीण पड़ जाती हैं तब परमात्मा को इस असंतुलन को ठीक करने और संतुलन को स्थापित करने के लिए शरीर धारण करना पड़ता है. जब भी आसुरी शक्तियां मजबूत होती हैं तो अपना एकछत्र राज्य कायम करने के लिए सीधे तौर पर दैवीय शक्तियों पर हमला बोल देती हैं. द्वापर और त्रेता युग में भी यही सामाजिक संतुलन बिगड़ गया था, जिसको ठीक करने के लिए श्रीकष्ण और श्रीराम को जन्म लेना पड़ा.

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कुल मिलाकर कहें को समाज में संतुलन स्थापित करने के लिए ही ईश्वर का हर युगों में समय-समय पर अवतार होता है. प्रभु अपने जन्म के साथ ही बुरी शक्तियों के विनाश की लीला करता है और संतुलन कायम कर यहां से प्रस्थान कर जाता है. फिर शनै:-शनै: आसुरी शक्तियां अपना प्रभुत्व जमा लेती हैं और फिर परमात्मा का आगमन होता है. यह प्रक्रिया सतत जारी है. जरूरत इस बात की है कि हम भी समय के श्रीक़ष्ण यानी महापुरुष की तलाश करें और उनके माध्यम से अपने जीवन के संतुलन को बनाए रखें.

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं.)

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