Wednesday , 14 April 2021

जोधावत ने बाल अधिकार पोस्टर विमोचन कर निराश्रित विद्यार्थियों को सम्बलन प्रदान किया

उदयपुर (Udaipur). समिधा बालगृह के सरंक्षक चन्द्रगुप्त सिंह चौहान ने बताया कि बालगृह के निराश्रित विद्यार्थियों ने राजस्थान (Rajasthan)राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् उदयपुर (Udaipur) का भ्रमण किया तथा निदेशक सु प्रियंका जोधावत से मिलकर कर आशीर्वाद प्राप्त किया तथा अपने हाथों से निर्मित भेंट निदेशक महोदय को याद स्वरूप प्रदान करी.

सु जोधावत ने बच्चों के प्रयासों को सराहा और बाल अधिकार पर पोस्टर का विमोचन कर निराश्रित विद्यार्थियों को सम्बलन प्रदान किया. निदेशक ने कहाँ की भारत में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सबसे अधिक आबादी है, तथा एक बड़ी संख्या में बच्चे निराश्रित तथा शिक्षा का सही ज्ञान नहीं मिलने के कारण जिंदगी में आगे बढऩे के अवसर नहीं प्राप्त कर सकते है. जब बच्चा वंचित रह जाता है तो, इस वजह से वह समाज को भी सही ढंग से अपनी सेवा नहीं दे पाता. शिक्षा ही एकमात्र ऐसा संसाधन है जो बच्चों तथा लोगो की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में बदलाव ला सकता है. शिक्षा की जागृति लाने एवं असमानता को दूर करने के लिए निराश्रित बच्चों की शिक्षा के लिए पहल  आवश्यक है. इसके लिए ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में रहने वाले बच्चों को आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता के साथ किताबें वितरित की जाए और विद्यालयों से जोड़ा जाए. पुरानी पुस्तकों को रद्दी में बेचने के स्थान पर डोनेट करके किताबों से वंचित बच्चों की शिक्षा में महती भूमिका अदा कर सकते हैं.

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अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् के एसोसिएट प्रोफेसर कमलेन्द्र सिंह राणावत ने कहा कि बचपन व्यक्ति की ज़िन्दगी का सबसे हसीन पल होता है, लेकिन भारत में बड़ी संख्या में अनाथ बच्चों को शिक्षा और अन्य कल्याणकारी उपाय न पहुंचने और निराश्रित बच्चों को अकेले छोड़ने के कारण बच्चों को अनैतिक कामों, भीख मांगने में छोड़ दिया जाता है. अतः निराश्रित बच्चों को विद्यालयों में नि:शुल्क प्रवेश की सुविधा का लाभ अधिक से अधिक रूप से पहुंचाना तथा अनाथ बच्चों को चिन्हित कर उनके नि:शुल्क प्रवेश के लिए नियम अनुसार सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए.

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चन्द्रगुप्त सिंह चौहान ने कहा कि बाहरी दुनिया मे कम संपर्क से निराश्रित विद्यार्थियों को जीवन का सीमित अनुभव ही मिल पाता है.  परिषद के उच्च अधिकारियों के संपर्क में आने से बच्चों के व्यक्तित्व का विकास व विश्वास प्रणाली विकसित नहीं होती है. माता-पिता का स्नेह एवं ध्यान की कमी से उनमें साइकोफिजियोलॉजिकल और साइकोसोमेटिक विकार, न्यूरोटिक विकार, संचार में कठिनाइयों  की अधिक संभावना है. मातृ वंचना के तहत जिस प्रकार का व्यक्तित्व बनता है उसे भावहीन कहा जाता है. वह दूसरों की तुलना में कमजोर महसूस करता है, वह कम आत्म-सम्मान, हीनता की भावना विकसित करता है. निदेशक महोदया से मिलकर निराश्रित विद्यार्थियों को मातृत्व स्नेह प्राप्त हुआ है. कार्यक्रम के दौरान परिषद के सयुक्त निदेशक शिवजी गौड़, डॉ. आभा शर्मा, डॉ. नीना शेखावत, डॉ. शालिनी एवं अन्य उच्च अधिकारी उपस्थित थे.

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