प्राचीन कृषि विरासत को समझने में सहायक सिद्ध होगी कृषि गीता-डॉ. नरेन्द्र सिंह राठौड़

उदयपुर (Udaipur). महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में एशियन एग्री-हिस्ट्री फाउण्डेशन के संस्थापक अध्यक्ष, स्व. डॉ. वाई. एल. नेने, के 85 वें जन्म दिवस पर डॉ. नरेन्द्र सिंह राठौड़, माननीय कुलपति, एमपीयूएटी, उदयपुर (Udaipur) ने कृषि गीता के हिन्दी संस्करण का विमोचन किया. पुस्तक का अनुवाद आंग्ल भाषा से हिंदी मे एमपीयूएटी के डॉ. एस. के. खण्डेलवाल, डॉ. देवेन्द्र जैन, डॉ. इन्द्रजीत माथुर एवं जी. बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर की डॉ. सुनीता टी. पाण्डे़य द्वारा किया गया है.

कुलपति, एमपीयूएटीे, डॉ नरेन्द्र सिंह राठौड़ ने पादप रोग विशेषज्ञ स्व. डॉ. वाई. एल. नेने, को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए डॉ. नेने को आधुनिक भारत का एक दुर्लभ और असाधारण कृषि वैज्ञानिक बताया. अपने उद्बोधन में डॉ राठौड ने कहा कि डॉ. नेने ने अपने 56 वर्षों के पेशेवर जीवन के दौरान, पादप रोगों और कृषि की अनेक चुनौतियों का सामना किया और अपने दृढ़, व्यवस्थित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ उन्हें हल किया. एशिया में विशेष रूप से भारतीय कृषि के प्राचीन और मध्ययुगीन ज्ञान में उनका योगदान, बेहद उपयोगी और अद्भूत है, जिसको आने वाले समय में सदैव याद किया जाएगा. उन्होंने कहा कि मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक कृषकों के साथ-साथ कृषि विद्यार्थियों व कृषि से अनुरक्त व्यक्तियों के लिए प्राचीन कृषि विरासत को समझने में सहायक और लाभदायक सिद्ध होगी. उन्होंने पुस्तक के अनुवादकों डॉ. खण्डेलवाल, डॉ. जैन, डॉ. माथुर एवं डॉ. पाण्डेय को बधाई देते हुऐ कहा कि अनुवादक लेखकों ने इसे सरल, सुबोध और सरस रूप में प्रस्तुत कर अपनी कार्यक्षमता एवं हिन्दी के प्रति अपने अनुराग को प्रदर्षित किया है.

डॉ. एस. के. खण्डेलवाल, सचिव, एशियन एर्ग्री-हिस्ट्री फाउण्डेषन राजस्थान (Rajasthan) अध्याय ने बताया कि  कृषि गीता मूलतः मलयालम देसम (केरल (Kerala)) की स्वदेशी कृषि प्रथाओं पर आधारित एक पांडुलिपि ग्रंथ है जिसके मूल लेखकों का ज्ञान नहीं है. कृषि गीता का मुख्य केंद्र बिंदु चावल पर है. हालांकि, खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिए, भगवान परशुराम ने किसानों को कुछ अन्य अनाज की फसलों को भी उगाने की सलाह दी थी, जैसे – नौ दानों की नवधान्य – गेहूं, चावल, लाल चना (अरहर या तुअर), हरा चना (मूंग), बंगाल चना (चना), सेम तिल, काला चना और कुलथी – विशेष रूप से अनाजों व वर्षा की कमी के समय में. स्पष्ट रूप से ये सभी फसलें केरल (Kerala) में हर जगह नहीं उगाई जा सकती हैं, लेकिन कुछ जलवायु या मृदीय स्थान मौजूद है, जहां कुछ या अधिकतर फसलों की खेती की जा सकती है. इसके अलावा, कई सब्जियों की फसलों, कंदों और रतालू, मसाले, केला, नारियल, सुपारी, पान, गन्ना और इसी तरह की खेती और स्थानीय रूप से अनुकूलित उपभेदों को इस पांडुलिपि में प्रतिपादित किया गया है.

इस अवसर पर एमपीयूएटी के संघटक राजस्थान (Rajasthan) कृषि महाविद्यालय के आणविक जीवविज्ञान एवं जैवप्रौद्योगिकी विभाग के डॉ. अजय शर्मा, डॉ. गणेश राजामाणि, डॉ. एस. के. खण्डेलवाल, डॉ. देवेन्द्र जैन एवं डॉ. अरूणाभ जोशी द्वारा लिखित ‘‘कॉन्सेप्ट्स इन प्लांट टिशू कल्चर और जेनेटिक ट्रांसफॉर्मेशन (थ्योरी एंड प्रैक्टिस)‘‘ नामक पुस्तक का विमोचन भी प्रो. नरेन्द्र सिंह राठौड़, कुलपति, एमपीयूएटी, उदयपुर (Udaipur) ने किया. माननीय कुलपति ने इस पुस्तक के लेखकों को बधाई देते हुए कहा कि मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक कृषि विद्यार्थियों एवं जैवप्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों को पादप ऊतक संवर्धन और आनुवंशिक परिवर्तन प्रौद्योगिकियों को समझने में लाभदायक सिद्ध होगी. समारोह में पुस्तक के लेखक डॉ. गणेश राजामाणि ने संक्षिप्त में बताया कि इस पुस्तक में पादप ऊतक संवर्धन (भाग-1) और आनुवंशिक परिवर्तन (भाग-2) की प्रमुख अवधारणाओं को विभिन्न अध्यायों में प्रतिपादित किया गया है.

इस अवसर पर कुलसचिव श्रीमति श्वेता फगेड़िया, वित्त नियंत्रक श्रीमति मंजूबाला जैन, क्षेत्रीय अनुसंधान निदेशक डॉ. रेखा व्यास, डीपीएम डॉ. जे.एल.चौधरी, छात्र (student) कल्याण अधिकारी डॉ. एम. ऐ. सलोदा, डॉ. एन. के. जैन, अधिष्ठाता डेयरी प्रौद्योगिकी, डॉ. महेश कोठारी, कार्यवाहक अधिष्ठाता, सीटीएई, डॉ. मीनू श्रीवास्तव, अधिष्ठाता, सीसीएएस, डॉ. बी. के. शर्मा, अधिष्ठाता, मात्स्यकी महाविद्यालय, डॉ. सुनील इन्टोदिया, परीक्षा नियंत्रक, डॉ. इन्द्रजीत माथुर, कार्यकारी अध्यक्ष, एशियन एग्री हिस्ट्री फाउण्डेशन, डा़ॅ पुष्पा सेठ, जन सम्पर्क अधिकारी डॉ. सुबोध शर्मा, ओ़.एस.डी. डॉ. वीरेन्द्र नेपालिया, व डॉ. एस. एस. राठौड़, ईओ. ईं., सुरेश मेहता, डॉ. अमित त्रिवेदी, डॉ. बी.एल. बाहेती, डॉ. पंवार, डॉ. दीपक आदि उपस्थित थे. कार्यक्रम का संचालन डॉ. गणेश राजामाणि ने किया एवं धन्यवाद की रस्म डॉ. देवेन्द्र जैन ने अदा की.

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