बुढ़ापे, ग़म और तंगी से जूझ रहे है गीतकार संतोषानंद!

(लेखक-डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट / )
बहुत कम लोग जानते होंगे कि गीतकार संतोष आनंद ने “इक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है…” गीत अपनी प्रेमिका के लिए लिखा था. प्रेमिका उनसे बिछुड़ गई थी 50 साल बाद प्रेमिका फिर उन्हें मिलेगी, इसका यकीन उन्‍हें भी नहीं था. बॉलीवुड (Bollywood) फिल्‍मों जैसी यह कहानी 85 साल के हो चुके संतोष आनंद के जीवन का एक अफसाना है.
उन्‍होंने बताया कि कुछ साल पहले उनकी प्रेमिका ने उन्हें फोन किया तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्‍हें लगता था कि वह शायद अब इस दुनिया में नहीं है. लेकिन 50 साल के बाद वह फिर मिली तो खुशी का ठिकाना नही रहा. उन्‍होंने प्रेमिका का नाम तो नहीं बताया, लेकिन इतना जरूर कहा कि वह पुणे (Pune) में रहती है और बराबर फोन करती है.हाल ही में एक टेलीविजन कार्यक्रम में संतोषानंद आए और उन्होंने
अपनी दर्द भरी बातें सुनाई तो हर किसी की आंखों में आंस आ गए. गायिका नेहा कक्कड़ ने संतोषानंद के प्रति अपनापन दिखाया, नेहा का अपनापन भी देखने वालों को खुशी के आंसू रुला रहा था.
गीतकार संतोषानंद ने बताया कि वह एक उड़ते हुए पंछी की तरह मुंबई (Mumbai) आते थे और चले जाते थे. उन्होंने रात-रात भर जग के गीत लिखे. उन्होंने अपने गीत अपने खून और कलम से लिखे.उन दिनो को याद करके संतोषानंद भावुक हो गए. वे बोले,’आज तो मेरे लिए ऐसा लगता है जैसे दिन भी रात हो गया है.’
वह कहते हैं, ‘मैं जीना चाहता हूं बहुत अच्छी तरह से. पैदल जाते थे देवी यात्राओं पर, पीले कपड़े पहनकर. राम जी ने मुझपर कृपा भी बहुत की थी. बहुत कुछ दिया भी था. सबकुछ कैसे चला गया. राम जी का कपाट किसने बंद कर दिया, मुझे आजतक पता नहीं चला. अब वो दौर तो नहीं, लेकिन इतना कहना चाहता हूं- जो बीत गया है वो अब दौर न आएगा, इस दिल में सिवा तेरे कोई और न आएगा. घर फूंक दिया हमने अब राख उठानी है, जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है.यह सुनते ही नेहा कक्कड़ रोने लगीं और नेहा ने कहा, ‘आपके लिखे जो गीत हैं उनसे हम सबने प्यार करना सीखा है. दुनिया के बारे में जाना है और सर मैं मेरी तरफ से आपको 5 लाख रुपए की भेंट देना चाहती हूं.’ यह सुनकर संतोष आनंद रो पड़े और कहा- मैं बड़ा स्वाभिमानी हूं, आज तक मैंने किसी से कुछ भी नहीं मांगा, मैं आज भी मेहनत करता हूं दूर-दूर जाकर. नेहा ने रोते हुए जवाब दिया,’आप ये समझिए की ये आपकी पोती की तरफ से है. इसके बाद रोते हुए संतोष आनंद ने कहा कि मैं यह राशि स्वीकार करूंगा.’ संतोष आनंद का जन्म 5 मार्च सन 1940 को सिकंदराबाद में हुआ. युवा अवस्था में ही एक दुर्घटना में वे एक टांग से विकलांग हो गए थे.शादी के दस साल बाद बड़ी मन्नतों से इन्हें पुत्र प्राप्त हुआ. इनके बेटे का नाम संकल्प आनंद रखा और एक बेटी शैलजा आनंद हैं. संकल्प गृह मंत्रालय (Home Ministry) में कार्यरत थे.सन 2014 में संकल्प आनंद ने अपनी पत्नी के साथ खुदख़ुशी कर ली थी.संतोषानंद के लिए पुत्र का निधन जीवन का सबसे बड़ा आघात है. गीतकार संतोषानंद ने फिल्मी जीवन
में अपने करियर की शुरुआत “पूरब और पश्चिम”फ़िल्म से सन 1970 में की.इस फिल्म का संगीत कल्याण जी आनंदजी द्वारा निर्माण किया गया था. सन 1972 में उन्होने फिल्म शोर के लिए “एक प्यार का नगमा” गीत लिखा.यह गीत उनका सबसे पसंदीदा गीत रहा. इस गीत को लता मंगेशकर और मुकेश ने अपनी आवाज दी थी. सन 1974 में फिल्म रोटी, कपडा और मकान के लिए उन्होंने कई गीत लिखे. इस फिल्म के गीत “मैं ना भूलूंगा” के लिए इन्हें अपने करियर का पहला फिल्म फेयर अवार्ड मिला.
वर्ष 1981 में इन्होने क्रांति फिल्म के गीत लिखे. यह फिल्म उस वर्ष की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म रही. उन्होने फिल्म प्यासा सावन के लिए गीत “तेरा साथ हैं तो” और “मेघा रे मेघा” लिखा. जिसके बाद उन्हें प्रेम रोग फिल्म के गीत के लिए फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया. संतोष आनंद ने कुल 26 फिल्मों में 109 गाने लिखे. शोमैन राजकपूर और अभिनेता मनोज कुमार की अनेक फिल्मों में उन्होने गाने लिखे. मशहूर गीतकार संतोष आनंद आज गुमनानी के दौर में हैं. उन्हें अपनी जिंदगी चलाने के लिए छोटे-मोटे कवि सम्मेलनों से खर्च निकालने पड़ रहे हैं.
उन्होंने बेटे की मौत के बाद खुद को घर में कैद कर लिया है.वे कहते हैं, ‘अब तो केवल जी रहा हूं. बेटे की मौत के बाद जिंदगी के सारे रंग चले गए. वैसे तो 1995 के बाद ही फिल्मों में गीत लिखना बंद कर दिया था, लेकिन बेटे की मौत के बाद खुद को घर में कैद कर लिया है. ‘ अब उन्हें इन गीतों में न तो कोई रंग और न ही उमंग नजऱ आती है. घर का खर्चे चलाने के लिए कवि सम्मेलनों में जाना उनकी मजबूरी हो गया है. शरीर अब उनका साथ छोड़ता जा रहा है और व्हील चेयर्स पर उनकी जिंदगी सवार हो गई है.
वे कहते है,आज गीतों पर बाजार हावी हो गया है.
पहले भी बाजार था, लेकिन उसके साथ कला भी थी. लेकिन आज गीतों पर बाजार हावी है और कला गायब है. उन्होंने जो भोगा, उसमें से कुछ पल निकाल गीतों में पिरोया. उनकी पूरी जिंदगी संघर्ष में बीती है. आज भी याद है जब राज कपूर ने फिल्म प्रेम रोग के लिए एक विदाई के गीत लिखने को कहा, तो वे सीधे दिल्ली अपने घर आ गए. उस वक्त बेटी छोटी थी. उसे गोद में लिया और बेटी की विदाई की कल्पना करने लगे. उनकी आंखों से आंसू निकलते रहे और फिर गीत-ये गलिया ये चौबारा…गीत का जन्म होता गया. फिल्म क्रांति का मारा ठुमका बदल गई चाल मितवा…में भी जिंदगी की फिलॉस्फी नज़र आती है.सच मे अमर गीतों के रचयिता दुःखो का पहाड़ जीवन के आखिरी दौर में ढोने को मजबूर है.

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