विवाद टिपटारे के लिए मध्यस्थता को दें संस्थागत रूप, जानकारों को तरजीह देने पर अच्छे आएंगे नतीजे : मल्होत्रा


नई दिल्ली. विवाद निपटाने के लिए मध्यस्थता के विकल्प को गंभीरता से लिया जाना चाहिए. कामचलाऊ व्यवस्था की जगह मध्यस्थता को संस्थागत स्वरूप दिया जाना चाहिए. 12वें अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने कहा कि मध्यस्थता कराने वाला जितना बेहतर होगा, नतीजे भी उतने ही बेहतर आएंगे.

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नानी पालखीवाला मध्यस्थता केंद्र (एनपीएसी) के तत्वावधान में आयोजित कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए इंदु मल्होत्रा ने जोर दिया कि मध्यस्थता के काम में प्रशिक्षित लोगों को लगाना चाहिए. न्यायिक समीक्षा का दायरा बढ़ाने के बजाय मध्यस्थता कराने के लिए विषय के जानकार को चुने जाने की जरूरत है. उन्होंने घरेलू और विदेशी मामलों की मध्यस्थता के लिए अलग-अलग कानून की पैरवी भी की. उन्होंने कहा घरेलू और विदेशी मध्यस्थता के मामलों के लिए दो कानून होने चाहिए, क्योंकि दोनों मामलों में व्यवस्था पूरी तरह अलग होती है. ऐसा नहीं होने से कई बार असमंजस की स्थिति बन जाती है.

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वरिष्ठ वकील और एनपीएसी के डायरेक्टर अरविंद पी. दातार ने पूरी तरह संस्थागत मध्यस्थता पर ध्यान देने को कहा. उन्होंने कहा कि सरकारी कंपनियों में संस्थागत मध्यस्थता की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए. लंदन के फाउंटेन कोर्ट चैंबर्स से जुड़ी ली-एन मुलकाही ने भी विशेषज्ञ मध्यस्थों का पूल बनाने की वकालत की. उन्होंने कहा कि भेदभावरहित मध्यस्थता किसी भी व्यवस्था के लिए बहुत जरूरी है.

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