मेवाड़ के 70वें एकलिंग दीवान महाराणा स्वरुप सिंह की 206वीं जयन्ती सोमवार को

उदयपुर (Udaipur). मेवाड़ के 70वें एकलिंग दीवान महाराणा स्वरुप सिंह जी (राज्यकाल 1842-1861 ई.स.) का जन्म पौष कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं. 1871 को हुआ था. महाराणा स्वरुपसिंह जी की 206वीं जयन्ती पर आज महाराणा मेवाड़ चेरिटेबल फाउण्डेशन उदयपुर (Udaipur) की ओर से पंडितों द्वारा पूजा-अर्चना की जाएगी. महाराणा सरदार सिंह जी ने 23 अक्टूबर 1841 को बागोर के कुंवर स्वरुप सिंह को गोद ले मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाया. वि.सं. 1899 आषाढ़ सुदि 8 (15 जुलाई 1842) को महाराणा स्वरुप सिंह जी की गद्दीनशीनी हुई.

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इन महाराणा को राज्य में प्रशासनिक और राजनीतिक सुधारों के लिए जाना जाता है. 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ हुई संधी को महाराणा ने बुद्धिमता से काम ले मेवाड़ में शांति स्थापित की. 1857 ईस्वी में नीमच में हुए विद्रोह में फंसे ब्रिटिश अधिकारी, महिलाओं एवं बच्चों को महाराणा ने शरण दे अपनी उदारता का परिचय दिया. महाराणा स्वरुप सिंह जी ने 15 अगस्त 1861 को सती प्रथा को समाप्त कर दिया. महाराणा स्वरूप सिंह जी ने उदयपुर (Udaipur) की टकसाल से ‘सरूपसाही’ नाम से नया सिक्कर जारी किया, जिसके एक ओर ‘चित्रकूट उदयपुर (Udaipur)’ और दूसरी ओर ‘दोस्ती लंदन’ अंकित करवाया था.

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महाराणा स्वरुप सिंह द्वारा किए गए निर्माण

महाराणा स्वरुप सिंह जी की वास्तुकला में बहुत रुचि थी. उन्होंने अपने शासनकाल में राजमहल में खुश महल, खुश महल चौक, खीच माता मंदिर तथा त्रिपोलिया के ऊपर हवा महल का निर्माण करवाया. यही नहीं महाराणा ने शरबत विलास, बृज विलास, सूर्य प्रकाश, स्वरुप विलास, छोटा दरिखाना आदि के भी निर्माण करवाये. महाराणा ने गोवर्द्धन विलास नामक महल, गोवर्द्धन सागर तालाब, पशु पतेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करवाया. शहर में स्वरूप बिहारी जी मंदिर, जगत शिरोमणि और जवान स्वरूप बिहारी मंदिर आदि का निर्माण करवाया. चित्तौड़गढ़ के सुप्रसिद्ध कीर्ति स्तम्भ का जीर्णोद्धार करवाया तथा उनकी माता बीकानेरी जी ने पीछोला तालाब के किनारे हरिमंदिर बनवाया, जिसकी महाराणा ने प्रतिष्ठा सम्पन्न करवाई.

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