Thursday , 25 February 2021

राष्ट्भक्ति की कसौटी धर्म नहीं

(लेखक/ -रघु ठाकुर)
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही के दो भाषणों के कुछ अंश पढ़ने को मिले. एक जो उन्होंने स्वर्गीय दत्तोपंत ठेंगड़ी के स्मृति व्याख्यान में पुणे (Pune)ं में दिया और दूसरा जो उन्होंने एक जनवरी को दिल्ली में महात्मा गाँधी के ऊपर लिखी गई एक पुस्तक के विमोचन के अवसर पर दिया. मोहन भागवत और संघ के पूर्व प्रमुख स्वर्गीय बाला साहेब देवरस के भाषणों को पढ़ने और सुनने का कई बार अवसर मिला है. तथा अस्पष्ट और बात को छिपाकर कहने की इनकी महारथ का अनुभव भी हुआ है. स्वर्गीय जय प्रकाश नारायण के अमृत महोत्सव के पटना (Patna) के कार्यक्रम में 1978 में मैं स्वत: मौजूद था, जिसमें स्वर्गीय बाला साहेब देवरस भी आए थे. पहले उन्होंने स्वर्गीय जयप्रकाश जी की उनके कदम कुंआ महिला चरखा समिति के निवास पर जाकर आरती उतारी थी और अभिनंदन किया था.

फिर हाल में आकर भाषण दिया था. इसमें उन्होंने कहा था ”मैं अक्सर प्रचार पर रहता हू अत: संपूर्ण क्रांति क्या है, पढ़ नहीं पाया. परन्तु जब जे.पी. जैसे महान पुरूष यह कहते है तो मान लेता हू, यह कोई महत्वपूर्ण बात होगी. ”मुद्दों से बचकर निकलने का इससे सुंदर उदाहरण व तरीका क्या हो सकता है? यह आयोजन 1978 में हुआ था और उससे पहले 25 जून 1975 के आपातकाल लगने से लेकर 77 के आरंभ तक लगभग 21 माह वे जेल में थे. तथा उस समय कोई प्रवास संभव ही नहीं था. क्या यह विश्वसनीय हो सकता है कि उन्होंने संपूर्ण क्रांति को न जाना हो या न पढ़ा हो. जिस संपूर्ण क्रांति के आँदोलन के संदर्भ में वे गिरतार हुए थे, उसके बारे में उन्हें पता न हो और बगैर पता किए ही वे उसमें शामिल हुए हों? यह विश्वसनीय नहीं लगता.

संघ के मूल विचारक स्वर्गीय गुरू गोलबलकर जी जिन्हें गुरूजी के नाम से संघ के लोग संबोधित करते है की, बहुत सारी स्थापनाओं से मैं सहमत नहीं हू. परंतु उनकी एक बात की तारीफ अवश्य करॅगा कि उन्होंने कभी अपने विचारों को छिपाकर या दबाकर व्यक्त नहीं किया. उनकी भले ही लोग कितनी ही आलोचना करें परंतु जो उनके अंतर्मन में था वे वही कहते थे. उनकी मृत्यु के बाद और बाला साहेब देवरस के समय से यह सधी – बंधी भाषण शैली आरंभ हुई है. स्वर्गीय दत्तोपंत ठेंगड़ी स्पष्ट वक्ता थे और बावजूद इसके कि वे संघ से एक प्रकार से उपेक्षित कर दिए गए थे, उन्होंने अपने विचार नहीं छिपाये. यहाँ तक कि जब स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तथा उन्होंने संघ के स्वदेशी नारे का वध किया तब भी दत्तोपंत ठेंगड़ी सार्वजनिक रूप से अटल जी की स्वदेशी विरोधी नीतियों की आलोचना करते रहे. जिसकी उन्हें काफी कीमत भी चुकाना पड़ी.

संघ सत्ता का महत्व गहराई से समझ चुका है. और इसलिए वह सदैव सत्ता के शीर्ष के साथ तब तक बना रहता है, जब तक वह पतन के कगार पर न पहुंच जाए. इस संबंध में वह दल या संगठन नहीं देखता बल्कि व्यवस्था के नियंत्रक व्यक्ति के साथ रहता है. चाहे वह श्रीमती इंदिरा गाँधी रही हो या स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी और अब नरेन्द्र मोदी.

  इस साल 70 हजार करोड़ की घरेलू रक्षा खरीद होगी: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

व्यवस्था समर्थक संगठनों का यह विशेष गुण या अवगुण जो भी कहा जाय होता है कि वे कितना ही बड़ा सवाल क्यूं न हो उसे मुद्दा नहीं बनाते. और चूँकि विचारों के प्रति उनका लगाव जीवन मूल्यों के रूप में या कर्मं में कम बल्कि शब्दों में ज्यादा हाता है, अत: उन घोषित मूल्यों के खिलाफ काम करने वाले सत्ताधीशों के साथ भी उनका कोई टकराव नहीं होता. शायद इसीलिए ऐसे संगठन टूटते भी नहीं है. हम समाजवादियों पर अकसर यह दोषारोपण होता है कि हम आपस में विचारों को लेकर टकरा जाते है, और बिखर भी जाते है. यह आरोप भी आंशिक रूप से सच है, परन्तु इसका एक कारण यह भी है कि समाजवादियों के मन में अपने वैचारिक मूल्यों के प्रति गहरा आग्रह होता है. समाजवादी विचारधारा मूलत: व्यवस्था को बदलने की विचारधारा और संघ की विचारधारा मूलत व्यवस्था को टिकाए रहने की विचारधारा है. इसीलिए यह फर्क स्वाभाविक है. यद्यपि इसके और भी कारण है. हमारे देश की पितृ सत्तात्मक व्यवस्था, जाति व्यवस्था, आदि भी इसके कारण है. परंतु फिलहाल वह मेरे विषय नहीं है. पूना के अपने भाषण में भागवत ने गुरू गोलवलकर जी और बाबा साहेब अम्बेडकर को समान श्रद्धा वाला बताया है, जो मानते थे कि विषमता धर्म नहीं है. संघ के पदाधिकारी अक्सर यह तर्क देते हैं कि संघ में कोई भेदभाव नहीं है, और सब साथ में मिल बांटकर व बैठकर खाना खाते है.

परंतु क्या साथ में खाना खाने से या ऐसे प्रतीकात्मक आयोजनों से जाति टूट सकती है? जाति विषमता और जाति श्रेष्ठता अक्सर जन्मना पैदा होती है. और जब तक जाति रहेगी. लाख समानता की बात कोई कहे जाति श्रेष्ठता का भाव और विषमता भी रहेगी. इसीलिए बाबा साहेब अम्बेडकर जाति के विनाश की कल्पना करते थे. उनकी पुस्तक है ”एनिहिलिएशन ऑफ कास्ट“. क्या मोहन भागवत जी बाबा साहेब के जाति से संबंधित विचारों का सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर संघ संगठन प्रणाली में लागू करने के लिए तैयार है? जब उनका विश्वास बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों में है तथा संघ व बाबा साहब की एक ही श्रद्धा है तो उन्हें हिन्दू धर्म ग्रंथों को त्याग देना चाहिये, क्योंकि बाबा साहब तो उन्हें ही जाति भेद का कारण मानते थे.

मुझे तो उनके हिन्दू परंपराओं के ज्ञान के बारे में भी कई बार शक होता है. उन्होंने एक बार इन्दौर (Indore) में कहा था कि हिंदुओं में शादी एक कांट्रेक्ट है. ”जबकि हिंदु परंपराओं में शादी जन्म जन्मांतर का और कम से एक जन्म का तो स्थाई निर्णय माना जाता है. हां इस्लामिक परंपराओं में जरूर शादी को कांट्रेक्ट माना गया है. और बतौर कांट्रेक्ट के ही निकाहनामा लिखा जाता है. शायद गुरूजी और बाबा साहेब की तुलना और उनमें समता बताना उनके लिए इसीलिए जरूरी है कि उन्हें अनुसूचित जातियों को संघ के साथ जोड़ना है. उन्होंने अपने भाषण में भी कहा कि धर्म जोड़ने वाला है. पहली बात तो यही है कि धर्म अभी तक व्यक्ति के द्वारा चयनित विचार नहीं है. बल्कि जन्म पुरखों और परिवार के द्वारा परंपरागत रूप से स्वीकृत व पालन किए गए विचार हैं.

सारी दुनिया में जो युद्ध हुए हैं, उनमें सर्वाधिक युद्ध धर्म के नाम पर ही हुए हैं. और अधिकांश तो एक ही धर्म के मानने वालों में हुए है. मेरा कहना यह नहीं है कि अंतर धर्म युद्ध नहीं हुए हैं, किंतु तुलनात्मक रूप से उनकी संख्या कम है. भगवान राम और रावण भगवान कृष्ण और कंस कौरव और पाण्डव कलिंग का युद्ध, ईरान और ईराक का युद्ध, जर्मनी और ब्रिटेन का युद्ध क्या यह युद्ध एक ही धर्म के मानने वालों में नहीं हुए है. अपने इस भाषण में भागवत ने यह भी कहा कि क्रांति से समता नहीं आती उन्नति का अर्थ है ”समरसता“.

  युवक ने मंदबुद्धि बालिका से किया दुष्कर्म

पर यह समझना होगा कि समरसता एक मनोभाव है और समता एक व्यवस्थागत लक्ष्य है. बगैर समता के समरसता कैसे आएगी? समता के बगैर भावनात्मक या शाब्दिक समरसता का क्या औचित्य है? और समता तब तक कैसे संभव भी है जब तक कि व्यवस्था और शासन प्रणाली में विषमता के पोषक तत्व मौजूद हैं. भागवत ने क्रांति को नकारने के लिए क्रांति का तात्पर्य हिंसक परिवर्तन से जोड़ने का प्रयास किया है. क्रांति के लिए हिंसा अनिवार्य नहीं है. बल्कि अहिंसक और लोकतांत्रिक प्रणाली के परिवर्तन ज्यादा सफल क्रांति होते हैं. संघ के बुद्धिजीवी योजनापूर्वक पहले समाजवाद और साभ्यवाद को एक बताते रहे जबकि 1950 में ही डॉ. राम मनोहर लोहिया ने ”समाजवाद और साभ्यवाद“ के फर्क और ”भारतीय समाजवाद“ को रेखांकित किया था. परंतु संघ के लोग समाजवाद परकीय विचारधारा है, कहकर समाजवादी विचारधारा याने समता की विचारधारा को बदनाम या आरोपित करने का प्रयास करते रहे हैं.

संघ एक विचित्र सामंजस्य की संस्था है, जिसे विदेशी हथियारों से परहेज नहीं है – विदेशी दवाईयों और वेक्सीन से परहेज नहीं है परंतु समाजवाद से परहेज है, जबकि लोहिया का समाजवाद तो वैदिक कालीन समता और प्रकृति आधारित सम्पूर्ण रूप से भारतीय विचारधारा है. यह अवश्य है कि लोहिया की भारतीयता उदारता की है और संघ की भारतीयता कट्टरपंथ की. अपने भाषण में भागवत ने कहा कि ”स्वतंत्रता और समता के लिए बंधु भाव आवश्यक है“, जबकि मेरी राय में इसके लिए बंधु भाव के साथ-साथ बंधु भाव वाली राजनैतिक व्यवस्था यानि समता वाली व्यवस्था भी अनिवार्य है. इसीलिए बाबा साहेब अम्बेडकर कहते थे कि ”संवैधानिक समाजवाद होना चािहए“.

भागवत जी कहते हैं कि धर्म के दो अंग है शास्वत धर्म और आचार्य धर्म. ”आचार्य धर्म युगानुकूल होता है, उसे बदलना पड़ता है. मेरी राय में शास्वत धर्म और तात्कालिक धर्म (आचार्य धर्म) के बारे में आज भी लोहिया की व्याख्या सबसे सटीक है कि धर्म दीर्घकालिक राजनीति है और राजनीति अल्पकालिक धर्म. रूढ़ियां, कुरीतियां और परंपराएं परिवर्तनीय हैं. परंतु इन्हें बदलने के लिए कई बार कानून भी बनाना होते हैं. यह केवल मानसिक कल्पनायें नहीं हो सकती. उन्होंने दीनदयाल जी का एक उदाहरण दिया कि उन्हें कोई सहयात्री गढ्ढे से निकालने गया तो उन्होंने कहा कि तुम झुको तभी हम ऊपर आ सकेंगे. झुकना व्यक्ति का गुण हो सकता है. किन्तु अगर व्यक्ति झुकने के लिए तैयार नहीं हो तो कानून से झुकाना जरूरी हो जाता है.

अगर केवल व्यक्ति के ऊपर झुकना और उठाना छोड़ दिया जाएगा तो यह शायद ऊपर उठना या उठाना संभव ही नहीं होगा और दूसरे नीचे और ऊपर की व्यवस्था कायम रहेगी कि एक व्यक्ति गिरता रहे दूसरा उठाता रहे. इसीलिए व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें न काई नीचे हो और न कोई ऊपर न कोई गिरा हुआ हो और न कोई उठाने वाला. व्यवस्था समतल हो जिसमें गढ्ढे ही न हों और वह व्यवस्था ही समाजवाद है. जब ऐसी व्यवस्था बनेगी जिसमें कोई गढ्ढा नहीं होंगे तभी दीनदयाल जी गिरने से भी बच पाएंगे और तब उठाने वाले जरूरत ही नहीं होगी. दरअसल भागवत बड़ी चतुराई से गढ्ढे और उठाने वाले ऊपर के व्यक्ति की व्यवस्था को कायम रखना चाहते है. गरीब गरीबी के गढ्ढे में गिरता रहेगा और टाटा-बिड़ला, आदानी, अम्बानी या उनकी दलाल सत्तायें थोड़ा थोड़ा यदा-कदा उठाते रहेंगे. संघ के मित्र लोग कथाओं के कुशल कथाकार हैं. जो कल्पित कथाओं को गढ़ने में माहिर है. और इसीलिए वे बगैर दिन-तारीख स्थान किसी के नाम के किस्से गढ़ते और सुनाते रहते है.

  महाराष्ट्र और केरल में कोरोना के दो नये प्रकार N440K और E484 K सामने आए

महात्मा गाँधी के ऊपर लिखी एक पुस्तक का विमोचन भाषण हाल ही में भागवत ने दिया है. वह पुस्तक मुझे पढ़ने को प्राप्त नहीं हुई हैं. हालांकि उसके संबंध में कुछ छिटपुट टिप्पणियां हिन्दुस्तान टाइम्स आदि अखबारों में पढ़ने को मिली हैं. मोहन भागवत ने इस भाषण में कहा कि ”कोई हिन्दू देशद्रोही नहीं हो सकता“. यह आश्चर्यजनक स्थापना है – ”जयचंद क्या हिन्दू नहीं था?“ बंबई के बम ब्लास्ट कांड में जिन लोगों ने बिध्वंसक सामग्री उपलब्ध कराई थी वे तो अधिकांश हिन्दू थे. भागवत चाहें तो कोर्ट का मुकदमा पढ़ सकते है. जिसमें उन हिंदुओं को सजा हुई है – जो लोग पाकिस्तान को खुफिया सूचनाएं देते पकड़ गए थे.

उनमें से अनेक लोग हिन्दू हैं. यहाँ तक कि म.प्र. भाजपा के युवा मोर्चा के एक पदाधिकारी तक पकड़े गए थे जो हिन्दू थे. म.प्र. के कटनी में आयुध निर्माण फैक्टरी के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी पौराणिक राम शुक्ला- अपने सैनिक बेटे जो कश्मीर में सेना में पदस्थ था माध्यम से फैक्टरी की खुफिया सूचनाओं को पाकिस्तान भेजते थे जो बाद में पकड़े गये तथा कोर्ट ने 7-7 साल की सजा दी. राष्ट्रद्रोही किसी भी धर्म का व्यक्ति हो सकता है. केवल हिन्दू को राष्ट्रभक्त बताना याने सिख, बौद्ध, पारसी, मुसलमान, जैन आदि गैर हिन्दू धर्मावलंबियों को अप्रत्यक्ष रूप से, बुनियादी रूप से राष्ट्रभक्त नहीं है मानना नहीं है याने देशद्रोही कहना जैसा हैं. यह कुछ ऐसा ही कहना है, जैसे कुछ कांग्रेस के मित्र कहते है, ”मुसलमान धर्म निरपेक्ष होता है, जबकि कट्टरपंथी सभी धर्में में मिलते है, और कट्टरपंथी धर्म निरपेक्ष नहीं हो सकता.

महात्मा गाँधी के ऊपर लिखी पुस्तक के विमोचन के अवसर पर भागवत जी भूल गए कि महात्मा गाँधी का हत्या (Murder) रा नाथूराम गोडसे भी हिन्दू था. धर्म के आधार पर राष्ट्रभक्त या राष्ट्रद्रोही तय करना यह राष्ट्र को बाँटने की मानसिक योजना और कल्पना है और मानसिक विभाजन भी कभी-कभी कालांतर में बड़े विभाजन का कारण बनता है. जो ऐसी स्थापनाएं प्रचारित कर रहे है. या तो वे राष्ट्र भक्ति का अर्थ नहीं समझते या फिर उनकी अपनी राष्ट्रभक्ति संदिग्ध है? क्योंकि राष्ट्र की मजबूती तो समूची जनता की ऐकता में ही निहित होती है.

Please share this news

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *