Wednesday , 16 October 2019
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लाल किले से विकास और सुधार का शंखनाद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामाजिक सरोकार, सुधार और परिष्कार की बात करते हैं. आत्मकवाद और अवांछनीयताओं से लड़ने की दृढ़ता प्रकट करते हैं. जन संवाद का एक भी मौका वे चूकते नहीं है. उन्हें पता है कि वे जो बात कह रहे हैं वह पहली और आखिरी नहीं है. पहले भी इसपर बातें होती रही हैं. आगे भी होती रहेंगी. बातों का यह सिलसिला थमने वाला भी नहीं है लेकिन इस तरह के निराशावादी भंवरजाल में फंसने की बजाय वे कुछ सार्थक करनी की कोशिश करते हैं. निर्णय अलोकप्रिय हो और अंशतः ही सही जनहितकारी हो तो वे उसपर बड़ा और कड़ा निर्णय लेने से चूकते नहीं हैं. उन्होंने लगातार छठवीं बार लाल किले की प्राचीर से 73वें स्वतंत्रता दिवस पर देश का जीवन स्तर आसान बनाने का भी आश्वासन दिया. यह भी कहा कि वे समस्याओं को अटकाने में नहीं,सुलझाने में विश्वास करते हैं. उनकी इस बात में दम भी है. जिस तरह उन्होंने जम्मू-कश्मीर की विकास की राह में बाधक बन रहे अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाया है, जिस तरह उन्होंने तीन तलाक कानून को समाप्त करने का निर्णय लिया है, उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता. 2014 में उन्होंने इसी लाल किले से स्वच्छता अभियान चलाने की बात की थी और उस अभियान का आगाज़ खुद झाड़ू लगाकर किया.

इसबार उन्होंने लाल किले की प्राचीर से छोटा परिवार रखने की बात की है और कहा है कि ऐसा करना सर्वोत्तम देशभक्ति है. जाहिर तौर पर उनका इशारा उनलोगों पर था जो बच्चे तो पैदा करते हैं लेकिन उनके उज्ज्वल भविष्य की प्लानिंग नहीं करते. खुद शिक्षा से दूर हैं और अपने बच्चों के लिए भी शिक्षा का उचित प्रबंध नहीं कर पाते. उनकी इस अशिक्षा का फायदा उन्हीं के बीच के पढ़े-लिखे लोग उठाते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगर मदरसों में भी अंग्रेजी और विज्ञान की शिक्षा देने की बात कही थी तो इसके मूल में एक ही बात थी कि मदरसे में पढ़े बच्चे भी ज्ञान-विज्ञान की मूलधारा से वंचित न रहें. हालांकि समाज सुधारक राजा राममोहन राय भी चाहते थे कि मुस्लिम बच्चे अंग्रेजी पढ़ें लेकिन मजहब का वास्ता देकर मुस्लिम समाज ने खुद को उर्दू और अरबी तक ही सीमित कर लिया. हम अगर माल्थस के सिद्धान्त पर भी गौर करते तो भी हमें पता होता कि ग्लोबल वार्मिंग, बिगड़ते प्राकृतिक असंतुलन, दुर्भिक्ष, बाढ़ और महामारी के लिए बढ़ती जनसंख्या ही बहुत हद तक जिम्मेदार है. पहली पंचवर्षीय योजना के दौरान भारत की आबादी 36 करोड़ थी जो अब बढ़कर 137 करोड़ हो गई है.

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आबादी के बढ़ते रथ को अगर रोका नहीं गया तो आनेवाला समय बेहद भयावह होगा. आबादी की बढ़ती रफ्तार पर चिंता तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी जता चुके थे. उसी दौरान उन्होंने परिवार नियोजन की सलाह भी दी थी. इंदिरा गांधी ने नसबंदी अभियान भी चलाया लेकिन वह इतने गलत और क्रूर ढंग से लागू किया गया कि उससे जनाक्रोश की आग में घी ही पड़ा. हालांकि बाद में लोगों ने इसकी अहमियत समझी, परिवार नियोजन अपनाया भी लेकिन एक वर्ग विशेष ने धर्म का वास्ता देकर अनवरत इससे दूरी बनाए रखी. अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी परिवार नियोजन पर जोर दिया गया लेकिन आदर्शों की अधिकता की वजह से यह मुहिम परवान न चढ़ सकी.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगर लाल किले से देश को छोटा परिवार रखने की नसीहत दी तो इसकी गंभीरता को समझना वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है ली कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए जन-जन में जागरूकता जरूरी है. सरकार को इसके लिए जरूरी कानून बनाना चाहिए. लोगों को जागरूक करने वाले अभियान भी चलाने होंगे. साथ ही चार बीवी और 40 बच्चे जैसे साक्षी महाराज जैसी प्रतिक्रिया पर भी रोक लगानी होगी. नरेंद्र मोदी ने कहा है कि 2014 से 2019 का दौर देश आवश्यकताओं की पूर्ति का था लेकिन मौजूदा कालखंड देशवासियों की आकांक्षाओं को पूर्ण करने का है. तीनो सेनाओं के बेहतर समन्वय के लिए उन्होंने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति की घोषणा की है. कारगिल युद्ध के दौरान जल, थल और वायु सेना के बीच समन्वय की जरूरत महसूस की गई थी. गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में इस बावत मंत्रियों की एक समिति बनी थी. इस समिति ने तीनों सेनाओं के संयुक्त मुख्यालय और सीडीएस पद के लिए सिफारिश की थी. राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में 20 साल से लंबित इस फैसले को अमली जामा पहनाने की घोषणा कर प्रधानमंत्री ने भारतीय सेनाओं को और मजबूती देने का प्रयास किया है.

नरेंद्र मोदी जानते हैं कि देश का विकास सबका साथ लेकर ही हो सकता है. यह सबका विश्वास की बिना पर ही संभव है. वे जानते हैं कि जब कभी राजनीतिक नफा-नुकसान से फैसले किए जाते हैं तो इससे देश का नुकसान होता है. उन्होंने भ्रष्टाचार निवारण पर तो जोर दिया ही, व्यवस्था और सामाजिक जीवन में बदलाव की भी अपेक्षा की. उन्होंने यह भी कहा कि व्यवस्थाएं चलाने वाले लोगों के मन में भी बदलाव होना चाहिए. उनका मानना है कि आजाद भारत का मतलब यह है कि सरकारें लोगों के जीवन से बाहर आएं और लोग अपने हिस्से में देश, परिवार और अपने सपनों को पूरे करने के लिए खुद आगे आएं.

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लालकिले की प्राचीर से अपने पहले संबोधन में उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान, जनधन योजना, स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया योजना की घोषणा की थी. 2015 में स्वतंत्रता दिवस पर अपने दूसरे भाषण में मोदी ने करीब 34 बार टीम इंडिया शब्द का इस्तेमाल किया था. गरीबों के लिए कई अन्य योजनाओं का ऐलान किया. उन्होंने कृषि मंत्रालय का नाम बदलकर कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय कर दिया था. ‘स्टार्टअप इंडिया’ स्कीम की शुरुआत की थी. 2016 में उन्होंने स्वराज से सुराज्य की तरफ बढ़ने की बात कही. सरकारी व्यवस्थाओं में तेजी लाने का जिक्र किया और महिलाओं के लिए उज्ज्वला योजना का ऐलान किया था. इसके अलावा महिलाओं के लिए मैटरनिटी लीव को बढ़ाने की भी घोषणा की. आयुष्मान भारत-नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम शुरू करने का ऐलान किया था. मेघालय और त्रिपुरा के राज्यों से अफ्सपा हटाने पर भी बात की. 2022 तक सबको घर देने का वादा किया थ. इसबार भी उन्होंने वैसा ही कुछ किया. प्रधानमंत्री ने लाल किले से जितनी भी योजनाओं की घोषणा की, वे बदस्तूर चल भी रही है. विकास का कारवां यथावत बढ़ता रहेगा, इसकी उम्मीद तो की ही जा सकती है.

सियाराम पांडेय शांत

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