Tuesday , 19 January 2021

मेवाड़ के कीर्ति पुरुष ‘महाराणा कुम्भा’ की आज 604वीं जयंती

उदयपुर (Udaipur). मेवाड़ के 47वें एकलिंग दीवान महाराणा कुंभा (राज्यकाल 1433-1468 ई.स.) का जन्म लोक मान्यतानुसार मकर संक्रान्ति विक्रम संवत् 1474 को देवगढ़ (राजसमन्द जिले) के पास मदारिया नामक गाँव में हुआ था.

महाराणा कुंभा एक कुशल शासक, युगीन विद्वान्, धार्मिक व्यक्ति, महान योद्धा, वास्तुकला विशेषज्ञ और महान संगीतकार थे. महाराणा कंुभा रचित रचनाओं में संगीतराज, सूद प्रबन्ध, संगीत रत्नाकर, रसिक प्रिया (गीत गोविंद की मेवाड़ भाष्य टीका, मूल रूप से संस्कृत), विद्या प्रबंधक हैं जो संगीत के उनके असाधारण ज्ञान को दर्शाती है. महाराणा कुंभा की ही तरह उनकी सुपुत्री रमाबाई ने जावर स्थित रमानाथ कुण्ड एवं विष्णु मन्दिर आदि का निर्माण करवाया.

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महाराणा कुम्भा शिल्पशास्त्र के ज्ञाता एवं अपने युग के प्रसिद्ध स्थापत्य निर्माता होने के साथ-साथ कला एवं कलाकारों के संरक्षक थे. मेवाड़ में लगभग 84 किलों मे से 32 किलों के निर्माण का श्रेय महाराणा कुम्भा को जाता है. उसी कारण उन्हें सुदृढ़ मेवाड़ के कीर्ति पुरुष भी कहा गया है.

मेवाड़ राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से आबू में अचलगढ़ (विक्रम सम्वत् 1509) व बंसतगढ़ का निर्माण करवाया. गोड़वाड़ क्षेत्र से सुरक्षा हेतु अजेय दुर्ग कुम्भलगढ़ (विक्रम सम्वत् 1515) का निर्माण एवं दुर्ग के चारों ओर 36 कि.मी. की परकोटे युक्त दीवार का निर्माण करवाया. ये निर्माण महाराणा कुम्भा की स्थापत्य अभिरूचि एवं राजनैतिक दूरदर्शिता का प्रमाण रहे. इसके अतिरिक्त चित्तौड़ दुर्ग का नवीनीकरण कर दुर्ग में प्रवेश हेतु पश्चिम की ओर दरवाजों और सुदृढ़ प्राचीर का निर्माण करवा दुर्ग का नवीन सुरक्षित प्रवेश मार्ग बनवाया.

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यही नहीं महाराणा कुम्भा के काल में चितौड़गढ़, अचलगढ,़ श्रीएकलिंगजी मंदिर, नागदा, कुम्भलगढ़, रणकपुर आदि में कई विश्वविख्यात मंदिरों का निर्माण व जीर्णोद्धार करवाया. चित्तौड़ दुर्ग में मंदिरों के अतिरिक्त जल आपूर्ति हेतु कुंडों, जलाशयों का निर्माण के साथ अपनी ऐतिहासिक विजय की स्मृति को बनाये रखने के लिये 9 मंजिला विजय स्तम्भ (मालवा विजय के उपलक्ष्य मंे) का निर्माण करवाया, जो भारतीय मूर्तिकला का अजायबघर भी कहलाता है.

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