चिंतन-मनन / प्रजा का खजाना


फारस के शासक साइरस अपनी प्रजा की भलाई में जुटे रहते थे. लेकिन खुद उनका जीवन सादगी से भरा था. वह रियासत की सारी आमदनी व्यापार, उद्योग और खेतीबाड़ी में लगा देते थे. इस कारण शाही खजाना हल्का रहता था. लेकिन प्रजा खुशहाल थी. एक दिन साइरस के दोस्त और पड़ोसी शासक प्रोशियस उनके यहां आए. उनका मिजाज साइरस से बिल्कुल अलग था. उन्हें प्रजा से ज्यादा अपनी खुशहाली की चिंता रहती थी.

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उनका खजाना हमेशा भरा रहता था. बातों-बातों में जब प्रोशियस को साइरस के खजाने का हाल मालूम हुआ तो उन्होंने साइरस से कहा, ‘अगर आप इसी तरह प्रजा के लिए खजाना लुटाते रहोगे तो एक दिन वह एकदम खाली हो जाएगा. आप कंगाल हो जाओगे. अगर आप भी मेरी तरह खजाना भरने लगें तो आपकी गिनती मेरी तरह सबसे धनी शासकों में होने लगेगी.’ साइरस मुस्कराए फिर बोले ‘आप दो दिन ठहरिए मैं इस मामले में लोगों का इम्तिहान लेना चाहता हूं.’ उन्होंने घोषणा करवा दी कि एक बहुत बड़े काम के लिए साइरस को दौलत की निहायत जरूरत है.

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उन्हें पूरी उम्मीद है कि प्रजा मदद करेगी. दो दिन पूरा होने से पहले ही शाही महल के बाहर मोहरों, सिक्कों व जेवरों का बड़ा ढेर लग गया. यह देख प्रोशियस हैरत में पड़ गए. साइरस ने कहा, ‘मैंने रियासत का खजाना लोगों की खुशहाली पर खर्च करके एक तरह से उन्हीं को सौंप दिया है. लोग उसमें इजाफा करते रहते हैं. मुझे जब जरूरत होगी वे मुझे लौटा देंगे जबकि तुम्हारा खजाना बांझ है, वह कोई बढ़ोतरी नहीं कर रहा है.’

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