पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से कांग्रेस दिग्गजों ने क्यों बनाई दूरी

नई दिल्ली (New Delhi) . पश्चिम बंगाल (West Bengal) विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) से कांग्रेस के दिग्गजों की दूरी की कैफियत यह दी जा रही है कि कांग्रेस एक तरफ बंगाल में मत विभाजन को रोकना चाहती है वहीं 2024 के लोकसभा (Lok Sabha) चुनाव की जमीन भी तैयार करने में जुटी है. कांग्रेस को ममता के उस पत्र का भी इल्म है जो उन्होंने भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता की दुहाई देते हुए लिखा था. पश्चिम बंगाल (West Bengal) विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) तीन मोर्चों के बीच लड़ा जा रहा है. पहला तृणमूल कांग्रेस, दूसरा भाजपा और तीसरा वाम-कांग्रेस नेतृत्व वाला गठबंधन. लेकिन मुख्य मुकाबला भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच में दिखाई दे रहा है.

बात तीसरे मोर्चे की करें तो भले ही कागजों पर समीकरण के हिसाब से यह चुनौती दे सकता है परंतु ऐसा लग रहा है कि यह गठबंधन ममता बनर्जी के विकल्प के तौर पर उभरने की बजाए भाजपा को हराने में ज्यादा विश्वास रख रहा है. अगर यह गठबंधन खुद को उभारने की कोशिश में होता तो वह जमकर मजबूती के साथ चुनाव प्रचार में अपनी ताकत दिखाता. लेकिन ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा. इस गठबंधन में शामिल लेफ्ट अपने सीमित संसाधनों का ही इस्तेमाल करके खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. वही कांग्रेस आलाकमान की दिलचस्पी पश्चिम बंगाल (West Bengal) चुनाव में नहीं दिखाई दे रही है. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी बंगाल से दूरी बनाए हुए है.

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राजनीतिक गलियारे में कांग्रेस के इस रवैए पर सवाल उठाए रहे है. साथ ही साथ अब गठबंधन के भीतर भी सवाल उठने लगे हैं. गठबंधन में शामिल इंडियन सेकुलर फ्रंट ने तो सीधे-सीधे कांग्रेस के इस रवैये पर आपत्ति दर्ज करा दी है. वहीं, अगर लेफ्ट से इस बारे में सवाल पूछा जा रहा है तो उनकी तरफ से यही जवाब आ रहा है कि आप कांग्रेस के नेताओं से पूछो. आखिर कांग्रेस का बंगाल से दूरी बनाने की वजह क्या है?

बंगाल के चुनावी नतीजे कांग्रेस को दीवार पर लिखी इबारत जैसी ही नजर आ रही है क्योंकि वह मान के चल रही है कि उसकी पार्टी का प्रदर्शन यहां अच्छा रहने वाला नहीं है. ऐसे में कांग्रेस ममता बनर्जी से दुश्मनी नहीं करना चाहती. कांग्रेस को लगता है कि अगर भाजपा और नरेंद्र मोदी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की जरूरत पड़ी तो ममता बनर्जी उस में अहम भूमिका निभा सकती हैं. पार्टी यह मानकर चल रही है कि भाजपा को तृणमूल हराए या फिर कांग्रेस बात एक ही है.

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वर्तमान के चुनाव में देखें तो कांग्रेस उन राज्यों में ज्यादा सक्रिय है जहां वह मुख्य मुकाबले में है जैसे कि असम और केरल (Kerala). हालांकि, इन दोनों राज्यों में भी वह बैसाखी के सहारे पर है लेकिन नेतृत्व उसी के पास है. इन दोनों राज्यों में अगर कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत होती है तो मुख्यमंत्री (Chief Minister) कांग्रेस का ही होगा. लेकिन पश्चिम बंगाल (West Bengal) और तमिलनाडु (Tamil Nadu) में कांग्रेस के लिए भूमिका बिल्कुल अलग है. कांग्रेस इन दोनों राज्यों में लेफ्ट और डीएमके के ऊपर निर्भर है. इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस अपनी ताकत झोंकने की बजाय अपने सहयोगियों पर ज्यादा निर्भर कर रही है. राजनीतिक विश्लेषक पश्चिम बंगाल (West Bengal) से कांग्रेस की दूरी की एक और वजह बता रहे हैं. यह वजह है केरल (Kerala).

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दरअसल, जहां पश्चिम बंगाल (West Bengal) में कांग्रेस लेफ्ट के साथ गठबंधन में है. वहीं केरल (Kerala) में कांग्रेस का मुख्य मुकाबला ही लेफ्ट से है. ऐसे में कांग्रेस के लिए मुश्किल यह थी कि केरल (Kerala) में जाए तो वाम के खिलाफ कैसे बोले और पश्चिम बंगाल (West Bengal) में आएं तो वाम के साथ कैसे दिखें. यही कारण रहा कि कांग्रेस की ओर से ज्यादा ध्यान केरल (Kerala) पर दिया गया. अब जब 6 अप्रैल को केरल (Kerala) में चुनाव खत्म हो जाएंगे तो शायद कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व पश्चिम बंगाल (West Bengal) में सक्रिय हो सकेगा.

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