खड़गे का बयान: सामाजिक न्याय संविधान की आत्मा है

नई दिल्ली, 12 फरवरी: राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जातिगत भेदभाव का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि हम अक्सर दलितों, वंचितों और कमजोर वर्गों के उत्थान की बात करते हैं. अब समय है कि इन बातों को जमीन पर उतारने की ठोस पहल की जाए. सामाजिक न्याय केवल नारा नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा है और इसकी रक्षा करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है.

खड़गे ने कहा कि इक्कीसवीं सदी में, जब हम सामाजिक विकास, सुधार और एकता की बातें करते हैं, तब ओडिशा की एक घटना हमें आईना दिखाती है. वहां एक आंगनवाड़ी केंद्र में सिर्फ इसलिए तीन महीनों से बहिष्कार चल रहा है क्योंकि भोजन एक दलित महिला हेल्पर और कुक द्वारा तैयार किया जा रहा है. कुछ लोग अपने बच्चों को वह भोजन देने से मना कर रहे हैं. यह सिर्फ एक महिला का अपमान नहीं, बल्कि हमारे संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक चेतना की भी परीक्षा है.

उन्होंने कहा कि यह एक गंभीर विषय है, जिस पर वह सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं. आंगनवाड़ी केंद्र बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास की बुनियाद होते हैं. अगर वहां जातिगत पूर्वाग्रह और भेदभाव की दीवार खड़ी कर दी जाएगी, तो इसका सीधा असर बच्चों के मन और उनके भविष्य पर पड़ेगा. छोटे-छोटे बच्चों के सामने जब इस तरह का भेदभाव होता है, तो अनजाने में उनके भीतर भी विभाजन और नफरत के बीज बो दिए जाते हैं. यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21(क) के तहत शिक्षा के अधिकार की भावना को कमजोर करती है.

खड़गे ने कहा कि इस घटना को केवल एक सामाजिक विवाद मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. इसे कार्यस्थलों पर होने वाले व्यापक जाति-आधारित भेदभाव के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए. हाल के वर्षों में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं. मध्य प्रदेश में एक आदिवासी मजदूर के साथ हुई अमानवीय घटना ने हमें झकझोर कर रखा है. गुजरात में एक दलित सरकारी कर्मचारी ने कथित उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या कर ली. चंडीगढ़ में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की मृत्यु के बाद संस्थागत भेदभाव के आरोप सामने आए. ये सभी घटनाएं संकेत देती हैं कि जातिगत पूर्वाग्रह केवल समाज के किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं है.

उन्होंने कहा कि ऐसा व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 का उल्लंघन है, जो समानता, भेदभाव निषेध और अस्पृश्यता उन्मूलन की गारंटी देते हैं. इसके साथ ही अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम जैसे सख्त कानून भी मौजूद हैं. इनका उद्देश्य ऐसे अपराधों को रोकना और दोषियों को दंडित करना है.

खड़गे ने सरकार से आग्रह किया कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लिया जाए. जहां भी जातिगत भेदभाव सामने आए, वहां त्वरित और निष्पक्ष जांच हो, दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो और पीड़ितों को सुरक्षा तथा न्याय सुनिश्चित किया जाए. साथ ही, आंगनवाड़ी जैसे संवेदनशील संस्थानों में जागरूकता अभियान चलाकर सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया जाए.

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