
नई दिल्ली, 22 फरवरी: पाकिस्तान में गरीबी पिछले 11 वर्षों के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है. योजना मंत्री अहसान इकबाल द्वारा जारी एक आधिकारिक सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 29 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है.
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 7 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में जीवन बिता रहे हैं. यह आंकड़ा 8,484 रुपये मासिक गरीबी रेखा पर आधारित है, जिसे बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए न्यूनतम आवश्यक राशि माना गया है.
वित्तीय वर्ष 2024-25 के प्रारंभिक निष्कर्ष बताते हैं कि 2018-19 के बाद से, जब पिछला सर्वेक्षण किया गया था, गरीबी में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. 2019 में गरीबी दर 21.9 प्रतिशत थी, जो प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदा सरकार के पहले वर्ष में बढ़कर 28.9 प्रतिशत हो गई.
रिपोर्ट के अनुसार, यह 2014 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है, जब गरीबी 29.5 प्रतिशत दर्ज की गई थी. आय में असमानता की स्थिति भी तेजी से खराब हुई है. सर्वेक्षण से पता चलता है कि असमानता बढ़कर 32.7 हो गई है, जो 27 वर्षों में सबसे ऊंचा स्तर है.
पाकिस्तान 21 वर्षों में सबसे अधिक 7.1 प्रतिशत बेरोजगारी दर का भी सामना कर रहा है. योजना मंत्री ने माना कि इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (आईएमएफ) प्रोग्राम के तहत आर्थिक स्थिरता के उपायों ने गरीबी बढ़ाने में योगदान दिया है. उन्होंने कहा कि सब्सिडी वापस लेने, एक्सचेंज रेट में गिरावट और अधिक महंगाई ने रहने का खर्च बढ़ा दिया.
प्राकृतिक आपदाओं और धीमी आर्थिक वृद्धि ने भी अधिक लोगों को गरीबी में धकेलने में भूमिका निभाई है. रिपोर्ट में बताया गया है कि 13 वर्षों में पहली बार गरीबी घटने का रुझान उलट गया है. ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी 28.2 प्रतिशत से बढ़कर 36.2 प्रतिशत हो गई है, जबकि शहरी गरीबी 11 प्रतिशत से बढ़कर 17.4 प्रतिशत हो गई है.
पंजाब में सात वर्षों में गरीबी 16.5 प्रतिशत से बढ़कर 23.3 प्रतिशत हो गई है. सिंध में यह 24.5 प्रतिशत से बढ़कर 32.6 प्रतिशत हो गई, जबकि खैबर पख्तूनख्वा में दर 28.7 प्रतिशत से बढ़कर 35.3 प्रतिशत तक पहुंच गई है. बलूचिस्तान सबसे बुरी तरह प्रभावित राज्य बना हुआ है, जहां लगभग आधी आबादी गरीबी में जी रही है और दर 42 प्रतिशत से बढ़कर 47 प्रतिशत हो गई है.
पिछले वित्तीय वर्ष में घरेलू खर्च में भी पांच प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई. हालांकि इनकम नाममात्र बढ़ी, लेकिन ऊंची महंगाई ने कमाई को पीछे छोड़ दिया, जिससे खरीदारी की शक्ति कम हो गई.