रमजान: संयम का महीना और आस्था की मजबूती का समय

नई दिल्ली, फरवरी 20: जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने रमजान के अवसर पर अपने संदेश में कहा कि इस वर्ष मुसलमानों को रमजान को आंतरिक सुधार और सिद्धांतों वाली जिंदगी के एक गंभीर परियोजना के रूप में देखना चाहिए.

उन्होंने बताया कि जब ईमान और उसूलों पर लगातार दबाव पड़ रहा है, तब रोजा रखने का उद्देश्य नेकदिली, सब्र और नैतिक ताकत को बढ़ाना है.

मीडिया को दिए एक बयान में उन्होंने कहा, “ईश्वर से भक्ति दिल की एक स्थिति है, जो अल्लाह की मौजूदगी और उसकी निगरानी का गहरा एहसास पैदा करती है. यह गुनाहों के प्रति हिचकिचाहट और अच्छाई की ओर एक स्वाभाविक आकर्षण उत्पन्न करती है.”

उन्होंने कहा कि रोजा आस्तिकों को रस्मों और बाहरी अनुशासन से परे जागृति के साथ जीना सिखाता है. रोजे के आध्यात्मिक पहलू पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि रोजा इंसान को शारीरिक सुखों के बजाय आध्यात्मिक सुखों से परिचित कराता है. भूख और नियंत्रण से यह स्पष्ट होता है कि शरीर का आराम सार्थक जीवन को परिभाषित नहीं करता.

सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने रमजान को ‘संयम का महीना’ बताते हुए कहा, “संयम का अर्थ है सभी बाहरी शक्तियों और आंतरिक मामलों के खिलाफ अपने उसूलों पर पहाड़ की तरह जमे रहना.” उन्होंने कहा कि रोजा भूख, प्यास, काम के बोझ और ध्यान भटकने के बीच काबू रखना सिखाता है.

उन्होंने कहा कि अल्लाह की खातिर नींद, खाने की आदतों और रोज के रूटीन में बदलाव करके, मानने वालों में मुश्किल फैसले लेने और दबाव में भी डटे रहने की इच्छाशक्ति और ताकत आती है.

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष ने सोशल मीडिया पर बेशर्मी के फैलने और आस्था तथा नैतिकता को लगातार चुनौतियों का सामना करने की बात की. उन्होंने मुसलमानों से कहा कि वे रमजान को केवल दिखावटी तौर पर मनाने से आगे बढ़ें और इसे अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ बनाएं, जिससे पवित्रता और पक्के इरादे से जुड़े व्यक्तिगत और सामूहिक सुधार हों.

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