बांग्लादेश में महिला सशक्तिकरण के दावों की असलियत

ढाका, 12 फरवरी: बांग्लादेश की कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने हाल ही में महिलाओं के प्रति समावेशी और सुरक्षात्मक छवि पेश की है. हालांकि, इसकी लंबे समय से चली आ रही रूढ़िवादी सोच में कोई वास्तविक बदलाव नहीं दिखता. एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है.

‘मालदीव्स इनसाइट’ की रिपोर्ट के अनुसार, जमात महिलाओं को प्रतिनिधित्व और सुरक्षा देने का वादा करती है. लेकिन नेतृत्व पदों पर महिलाओं की अनुपस्थिति और चुनाव में किसी भी महिला उम्मीदवार को न उतारना, इसके दावों को कमजोर करता है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि शरीयत कानूनों पर जमात का अस्पष्ट रुख यह दर्शाता है कि उसकी सोच अब भी अलगाव और अधीनता पर आधारित है, न कि वास्तविक सशक्तिकरण पर.

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है, “इस्लामी आंदोलनों में महिला सशक्तिकरण का सवाल हमेशा विरोधाभासों से भरा रहा है. बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी इसका एक स्पष्ट उदाहरण है. सतह पर पार्टी का चुनावी घोषणापत्र समावेशिता की बात करता है, लेकिन पुराने रुख और व्यवहार के संदर्भ में ये वादे वास्तविक लैंगिक समानता के बजाय प्रतीकात्मक कदम लगते हैं.”

चुनावी सभाओं में जमात के अमीर शफीकुर रहमान ने महिलाओं की “सुरक्षा और गरिमा” को प्राथमिकता बताया है. उन्होंने आश्वासन दिया कि महिलाएं “घर, सड़क, कार्यस्थल और हर जगह सुरक्षित रहेंगी.” घोषणापत्र में सुरक्षित कार्य वातावरण, मातृत्व के दौरान कम कार्य समय, महिलाओं के लिए विशेष बस सेवाएं, सीसीटीवी कैमरे और आपातकालीन हेल्पलाइन जैसी घोषणाएं शामिल हैं.

हालांकि, रिपोर्ट का कहना है कि ये वादे सशक्तिकरण की बजाय संरक्षण पर अधिक जोर देते हैं. इससे यह धारणा मजबूत होती है कि महिलाओं को सक्रिय सार्वजनिक भागीदारी के बजाय संरक्षित किए जाने वाले कमजोर वर्ग के रूप में देखा जा रहा है.

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि आगामी चुनाव में जमात-ए-इस्लामी ने एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है. इससे मंत्रिमंडल में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के दावे पर सवाल खड़े होते हैं. पार्टी नेतृत्व ने यह भी स्पष्ट किया है कि महिलाएं सर्वोच्च पदों पर नहीं आ सकतीं.

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