संगीत की दुनिया का ध्रुव तारा: उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान की कहानी

मुंबई, 2 मार्च: भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान ने अपनी अद्वितीय पहचान बनाई है. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी शास्त्रीय संगीत को समर्पित किया. उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान से नवाजा गया. लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी पहली प्रस्तुति महज आठ साल की उम्र में हुई थी. यह छोटी सी शुरुआत आगे चलकर एक बड़े इतिहास में बदल गई.

उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान का जन्म 3 मार्च 1931 को उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में हुआ. उनका परिवार संगीत से जुड़ा हुआ था. घर में रियाज का माहौल रहता था. उनके पिता उस्ताद वारिस हुसैन खान और परिवार के अन्य सदस्य भी संगीत में थे. यही वजह थी कि उन्होंने बहुत छोटी उम्र से सुर और राग सीखना शुरू कर दिया. घर ही उनका पहला स्कूल था और पिता उनके पहले गुरु.

जब वह सिर्फ 8 साल के थे, तब जन्माष्टमी के मौके पर बदायूं के विक्टोरिया गार्डन में एक कार्यक्रम रखा गया. वहां के नगरपालिका अध्यक्ष ने उनसे गाने के लिए कहा. उन्होंने मंच पर आत्मविश्वास के साथ गाया. लोगों ने उनकी आवाज को बहुत पसंद किया. यह उनका पहला स्टेज शो था. उनकी परफॉर्मेंस को देख कई लोगों ने कहा कि वह आगे चलकर बड़े कलाकार बनेंगे. इस छोटी सी प्रस्तुति ने उनके जीवन की दिशा तय की.

उन्होंने फिल्मों में भी थोड़ा काम किया. उन्होंने ‘भुवन शोम’ से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की. इसके अलावा, उन्होंने ‘उमराव जान’, ‘आगमन’ और ‘श्रीमान आशिक’ जैसी फिल्मों में भी अपनी आवाज दी. हालांकि, उनका मन हमेशा शास्त्रीय संगीत में ही रमा रहा.

उन्होंने कई बड़े कलाकारों को संगीत की शिक्षा भी दी, जिनमें लता मंगेशकर, आशा भोसले, मन्ना डे, ए. आर. रहमान और सोनू निगम जैसे नाम शामिल हैं.

उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें कई बड़े सम्मान दिए. साल 1991 में उन्हें पद्मश्री मिला. 2006 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. साल 2003 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला और 2018 में उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया, जो देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है.

जीवन के आखिरी वर्षों में उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ, जिससे उनकी तबीयत खराब रहने लगी और 17 जनवरी 2021 को मुंबई में 89 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.

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