
नई दिल्ली, मार्च 18: पश्चिम एशिया में सैन्य संघर्ष की स्थिति गंभीर होती जा रही है. 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया. इस संयुक्त हमले में ईरान के कई प्रमुख नेता और शीर्ष अधिकारी मारे गए. यह सिलसिला अब भी जारी है. ये नेता ऐसे थे जिनसे प्रशासन चलता था और देश की जनता की उम्मीदें इन पर टिकी थीं.
पहले दिन की एयर स्ट्राइक में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई. उनके साथ उनके परिवार के कई सदस्य और उच्च अधिकारी भी मारे गए. यह जानकारी हर गुजरते दिन के साथ सामने आई.
1 मार्च को, ईरान के आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ और रक्षा मंत्री सैयद अब्दुलरहीम मौसवी की मौत की खबर आई. उन्हें एक हवाई हमले में मारा गया, जिसमें डिफेंस काउंसिल की एक बैठक को निशाना बनाया गया था.
इसके अगले दिन, 2 मार्च को, ईरान की न्यायपालिका ने पुष्टि की कि शक्तिशाली रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के प्रमुख जनरल मोहम्मद पाकपुर भी इस हमले के शिकार बने.
मोहम्मद शिराजी की मौत भी ईरान के लिए एक बड़ा सदमा थी. वे 1989 से लेकर अपनी मृत्यु तक सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के मिलिट्री ब्यूरो के प्रमुख रहे. उनकी भूमिका ईरान के शीर्ष सैन्य कमांडरों और सुप्रीम लीडर के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में थी.
सालेह असादी, जो ईरान के एक सैन्य खुफिया अधिकारी थे, ने खातम-अल-अंबिया सेंट्रल मुख्यालय में खुफिया विभाग के प्रमुख के रूप में कार्य किया. इस मुख्यालय का काम ईरान के सशस्त्र बलों के जनरल स्टाफ के भीतर आपातकालीन कमांड संरचना को संचालित करना था.
28 मार्च के बाद, ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारीजानी का जाना भी एक बड़ा झटका था. वे युद्ध के समय के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिकार थे. उनके साथ बसीज कमांडर गुलामरेजा सुलेमानी की भी मौत हुई; दोनों 17 मार्च को तेहरान पर किए गए सटीक हमलों का शिकार बने.